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05.06.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

Kailash

छठा दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

धारचूला से गाला

09/6/2010

गाला की ऊँचाई 2378 मीटर

छठा दिन

 चूँकि आज यात्रा शुरू करने का समय सुबह नौ बजे निश्चित हुआ था इसलिए सभी आराम से सोकर उठे। सामान तो रात को ही लगाकर सोए थे। सुबह कमरे में ही चाय आ गयी। स्नान आदि से निवृत्त होकर नीचे हॉल में जाकर देखा तो सभी यात्री अपना लगेज वहाँ लाकर रख रहे थे। सामने ही इलेक्ट्रोनिक-तराजू रखा था। बालाजी तथा अन्य यात्री सामान का वज़न करवा रहे थे। हमने भी अपना लगेज वहाँ लाकर तुलवा दिया। सभी ने दिल्ली में मिले अपने-अपने बेंत ले लिए और मार्कर से अपना-अपना नाम लिख लिया।

दूसरी ओर पोनी-पोर्टर के लिए रजिस्ट्रेशन हो रहा था। हमने अपना रजिस्ट्रेशन कराया और स्लिप लेकर नाश्ता करने चले गए। नाश्ते में छोले-पूरी और दही था। सभी अपने-अपने में व्यस्त थे।

हम और वीना मैसूर सब काम से निवृत्त होकर कुछ फोटोग्राफ्स लेने लगे और बाद में रिसेप्शन के पास पड़े सोफों पर बैठ गए। जब एलओ की सीटी बजी तो उठकर वहाँ पहुँच गए। उन्होंने ग्रुप्स बनाए और जीप में बैठने को कहा। हमारा पूरा ग्रुप एक ही जीप में था। साढ़े नौ बजे के आसपास जय भोले की ध्वनि के साथ हमने धारचूला छोड़ दिया।

धारचूला इस यात्रा में आखिरी बड़ा शहर है। काली नदी के किनारे चलते हुए ठेठ पहाड़ी रास्ते पर अभी कुछ ही दूर चले थे कि जीप रोक दी गयी। सीमा-सड़क-सुरक्षा-बल के जावानों ने बताया कि मंगती तक जाने वाले मार्ग पर काम प्रगति पर है इसलिए डाइनामाइट लगाकर पहाड़ गिराए जा रहे हैं। लगभग तीन घंटे हम वही तेज़ धूप में रुके रहे। जीप में अंदर बैठने का मन नहीं और बाहर प्रचंड सूर्य झुलसा रहा था। बोतलों का पानी समाप्त हो चला तो यात्रियों ने पास में ही बहते झरने से पानी लेकर पीना शुरू कर दिया।

कुछ यात्री पैदल जाकर डाइनामाइट लगाकर पहाड़ गिराने का दृश्य देखने आगे चले गए, पर वहीं तक पहुँच पाए जहाँ तक खतरा नहीं था। पहाड़ तोड़कर सड़क से मलवा हटाने पर ही हमारी जीपों को आगे बढ़ने दिया गया।

लगभग ढाई बजे जीप मंगती छोड़कर चलीं गयीं। धूप के बीच रुक-रुक कर बारिश भी हो रही थी। रास्ता पूरी तरह गीला था। मिट्टी का गारा बना हुआ था। पैर गारे में फँस रहे थे।

गाइड और एलओ के साथ सभी खड़े थे। यहीं से हमे पोनी और पोर्टर मिलने थे। वही ठेकेदार जिसने सुबह रजिस्ट्रेशन किया था, यहाँ खड़ा मिला और डिमांड के अनुसार पोनी और पोर्टर मिलवा दिए। जिन्होंने पोनी और पोर्टर नहीं माँगे थे वह यात्री एलओ से कहकर पुराने यात्री जुनेजाजी के साथ पैदल चल पड़े।

यहाँ से गाला का रास्ता बहुत चढ़ाई वाला नहीं था और लगभग तीन-साढ़े तीन घंटे का ही था सो एलओ ने सभी को पैदल चलने की सलाह दी पर मैं सुबह जीप में बैठे रहने से बहुत बोर हो गयी थी और जल्दी पड़ाव पर पहुँचना चाहती थी इसलिए पोर्टर को अपना हाथ वाला थैला पकड़ाकर पोनी मिलते ही उस पर चढ़ कर चल पड़ी।

बाद में पता चला कि स्नेहलता और वीना मैसूर भी घोड़े पर चढ़कर आ रहीं थी पर स्नेहलताजी घोड़े से असंतुलित होकर गिर गयीं थीं भोले की कृपा से चोट नहीं आयी थी। पर वह थोड़ी परेशान अवश्य हुईं थीं।

बीच में एक बार पोनी चलाने वाले लड़के ने किसी पहाड़ी गाँव में चाय की दुकान पर मुझे उतारा। वहाँ अन्य यात्री भी चाय पी रहे थे, भीड़ सी थी। दुकान बहुत छोटी थी। मैं दुकान के सामने दूसरी ओर पत्थर पर जाकर बैठ गयी। दो लड़कियाँ चाय लेकर आयीं। मैंने उनसे पूछा तो पता चला कि वह इसी गाँव की हैं। धारचूला में बी.ए. की पढ़ाई कर रही थीं। इस समय कैलाश-मानसरोवर और छोटा-कैलाश के यात्री यहाँ से गुज़रते हैं तो कुछ बिक्री हो जाती है इसलिए यहाँ आयी हुई थीं।

चाय पीकर हम जल्दी ही चल पड़े। रास्ते में बारिश होने लगी। बारिश के कारण अँधेरा घिर गया था पर तब तक हम गाला के गेस्ट हाऊस में पहुँच गए।

घुसते ही एक नया अध-बना बड़ा सा कमरा था जहाँ चौदह तख्त और बिस्तर लगे थे। हमें वहाँ ठहरना था। एलओ पहले ही आगए थे और कमरे बाँट दिए थे। उन्होंने यह कमरा सभी ग्यारह स्त्रियों को दिया था पर यात्री थके होने के कारण अपनी पसंद से रुक गए। हमारे कमरे में चार दंपत्ती और हम चार स्त्रियाँ ठहर गए।

सुबह से भूखे थे सो सभी खाना खाने पहुँच गए। खाना बनाने वाले तेज़ी से रोटियाँ नहीं सेंक पा रहे थे। जबकि यात्री बहुत भूखे थे। रोटी की आपाधापी सी हो रही थी।

वहाँ सेटेलाइट-फोन की सुविधा भी थी। हम खाना खाकर फोन करने की लाइन में लग गए। सामने यात्री खुले में एलओ के साथ मुँडेर-सी पर बैठकर कुछ मनोरंजक कार्यक्रम करके महौल को खुशनुमा बना रहे थे। मुँडेर से प्राकृतिक दृश्य जान लेने को आतुर थे। हमने कैमरे में उन्हें संजोया।

धीरे-धीरे सभी वहाँ पहुँच गए। जब पुनः बारिश होने लगी तो सभी अपने-अपने कमरे में आकर सो गए।

"सूप लो" की तेज़ आवाज़ से नींद खुल गयी गर्म सूप पीकर थोड़ी राहत मिली। सबने बिस्तर में बैठे-बैठे ही कुछ देर तक कीर्तन किया।

रात का भोजन जल्दी तैयार हो गया था, पर किसी को तेज भूख नहीं थी। एलओ साहब ने सभी को जबरदस्ती बुलवाकर थोड़ा-बहुत अवश्य खाने को कहा। सभी ने उनका कहना माना।

कल छः बजे यात्रा शुरू करनी थी सो अपने कमरे में आकर सो गए।

बाहर तेज़ बारिश हो रही थी। लाइट नहीं थी मोमबती बंद करके सब लेट गए, पर अचानक कमरे के दरवाज़े खटखटाने की आवाज़ से आँख खुल गयी।

दरवाज़ा खोलने पर कु.मं.वि.नि. का कर्मचारी आया और कहने लगा, "यहाँ एक महिला-यात्री को ठहराना है। वह आदि कैलाश की यात्रा पर रास्ते में बीमार हो जाने पर वापिस आ रहीं हैं।" जल्दी से एक बिस्तर लगाया गया। तभी एक दक्षिण-भाषी स्त्री कराहतीं हुईं कमरे में लायीं गयी और बिस्तर पर लिटा दीं गयीं। चूंकि उनकी बात किसी को समझ नहीं आरही थी तो हमने वीनामैसूर और श्रीमती से उनका हाल पूछने और परेशानी समझने को कहा।

पता चला कि नवींढंग में मौसम खराब होने के कारण वह चल नहीं पा रहीं थी, उन्हें साँस लेने में परेशानी हो रही थी और घोड़े पर उनकी पीठ में दर्द होता था सो वह वापिस लौटा दीं गयीं। उनको खाना खिलाकर लिटा दिया गया। हम सब भी थके हुए थे सो बिस्तर पर पड़ते ही सो गए।

- क्र्मशः

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