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04.28.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

Kailash

चौथा दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

पिथौरागढ़ से धारचूला (वाया मिरथी)

08/6/2010

मिरथी में अविस्मरणीय स्वागत

 पाँचवाँ दिन_2

दोपहर होते-होते बस मिरथी जाकर रुकी। बस के रुकते ही जो यात्री पहले जा चुके थे तेज़ी से नीचे उतर गए। हम सब भी उतर गए। बैंड-बाजे बज रहे थे। जब आई.टी.बी.पी. के जवानों को अपने दल के स्वागत में खड़े देखा तो मन अद्भुत भाव से भर गया। हमारे स्वागत में स्थानीय विद्यालय की छात्राएँ नृत्य के माध्यम से भगवान-शिव झाँकी प्रस्तुत करते हुए हमारे साथ चल रहीं थीं। स्थानीय लोक-कलाकार परंपरागत वेशभूषा में छलिया-नृत्य करते हुए चल रहे थे।

आगे जाकर मुख्य स्वागत-कर्ता आई.टी.बी.पी. के कमांडर-इन-चीफ़ श्री ए.पी.एस. निंबाड़ियाजी और वन-मित्र पदमश्री श्री राठौरजी हमारे दल के स्वागत में खड़े थे। उन्होंने एलओ को पुष्प-गुच्छ भेंट किए, छोटी सी बालिका ने तिलक लगाया। दल में आयु में सबसे बड़े श्री बंसलजी और सबसे छोटे श्री अमरकुमार का भी स्वागत किया। वहीं एक छोटे से शिवालय में सभी से जलाभिषेक करवाया और सिपाहियों द्वारा तिलक लगाया गया।

इसके साथ ही मुख्य भवन में प्रवेश किया।। जहाँ श्री निंबाड़ियाजी और राठौरजी के साथ सारे दल का ग्रुप फोटो लिया गया। फोटो लेने के लिए सीट नामांकित-पर्ची चिपकी हुई पहले से ही निश्चित थीं, सभी अपने निर्धारित स्थान पर बैठ गए और फोटो खिंचवाया। तत्पश्तात सभी को जलपान हेतु बड़े कक्ष में ले जाया गया जहाँ दो बड़ी मेज़ों पर बड़े ही शिष्ट ढंग से स्वच्छ और शुद्ध कई प्रकार का जलपान लगाया हुआ था। बड़े ही आत्मीय ढंग से आग्रहपूवर्क परोसा जा रहा था। निंबाड़ियाजी स्वयं वहाँ उपस्थित थे। जवानों का यह रूप उनकी अनुशासन और कलात्मकता का रूप प्रस्तुत कर रहा था। सभी ने स्वादानंद लिया और उनके इस प्रबंधन की दिल खोलकर प्रशंसा की। उसी कक्ष में एक ओर बड़ी मेज़ पर कैलाश-मानसरोवर यात्रा से संबंधित कुछ सामान और दस्तावेज़ों की प्रदर्शनी भी लगी हुई थी। सबने बड़ी उत्सुकता से देखा और तत्संबंधी प्रश्न भी पूछे, जिनके वहाँ खड़े जवानों ने संतुष्टीपूर्ण उत्तर भी दिए।

जलपान के बाद संबोधन कक्ष में ले जाया गया। जहाँ चारों कुछ सोफ़े और कुर्सियाँ लगीं थीं। सब बैठ गए। सबसे पहले उन्हीं छात्राओं ने जो हमारे साथ नृत्य करते हुए आयीं थीं, अपनी मधुर वाणी में स्वागत-गान गाया और कुमाऊं गीत पर नृत्य भी प्रस्तुत किया। सभी ने बालिकाओं की भूरि-भूरि प्रशंसा की मानों साक्षात देवियाँ हीं हमारे लिए पधारी हों।

इसके बाद निंबाड़ियाजी ने औपचारिक स्वागत-भाषण की शुरूआत की पर कब वह हमारे लिए पर्वतारोहण की ट्रेनिंग में बदल गयी पता ही न चला। एक पर्वतारोही को किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए यह सब दृश्य-श्रव्य सामग्री के साथ बहुत सरल भाषा में और विस्तार से स्पष्ट किया। ये टिप्स सभी के बहुत काम आए।

उनके बाद श्री राठौरजी का संबोधन था जिसमें उन्होंने शुभकामनाओं के साथ-साथ पहाड़ों और वनों को नुकसान न पहुँचाने की भी बात कही।

अंत में एलओ ने अति संक्षिप्त रुप में धन्यवाद देते हुए समस्त-दल की ओर से उनके सुझावों को मानने का वायदा किया और विदाई ली। विदाई भी तो अति भावपूर्ण थी। सभी को सौंफ़ और मिश्री खिलाकर और फौजी बैंड की धुन बजाकर भेजा जा रहा था। हर यात्री पर व्यक्तिगत ध्यान दिया जा रहा था। हम सब गौरवान्वित अनुभव कर रहे थे, उन सब के प्रति आभार मान रहे थे। यात्रा के उत्साह को अत्यधिक बढ़ाने वाला यह स्वागत कभी भी न भूला जा सकेगा।

मिरथी में काफ़ी देर हो गयी थी। निर्धारित समय से कहीं ज़्यादा समय लग गया था। सभी बस में बैठे और बस चल पड़ी। सब अपने स्वागत के सुखद भावों में डूबे थे और बस दौड़ रही थी। मिरथी से धारचूला नीचे ढलान पर है सो बस तेज़ी से दौड़ रही थी। शाम सात बजे के आसपास हम धारचूला के कुमाऊं-मंडल विकास निगम के गेस्ट-हाऊस में प्रवेश कर गए।

प्रवेश करते ही रिसेप्शन था जहाँ खड़े होकर एलओ ने सभी को कमरा नं और सहयात्री बता दिए। सभी अपने कमरे की चाबी लेकर चल दिए। हम चारों स्त्रियाँ एक ही कमरे में थी। कमरे बहुत बड़े थे। साफ़-सुंदर, अटैच बाथरूम। टीवी लगा हुआ था। सामने दो खिड़की और एक दरवाज़ा। स्नेहलताजी ने दरवाज़ा खोला तो सभी बाहर पहुँव गए। वाह! क्या कल-कल ध्वनि थी! छोटी सी अर्धगोलाकार बालकनी के बिल्कुल सामने काली नदी पूर्ण वेग और ध्वनि के साथ दौड़ रही थी। नीचे से कहा गया कि सूप ले लो। हम चारों सूप लेने नीचे गयीं तभी देखा कि हमारा लगेज भी आगया है। रिसेप्शन पर बने बड़े कक्ष में ही सबके एक जैसे सफेद बोरे फैले हुए थे। सब बोरे पर अपना-अपना नाम ढूँढ रहे थे। मैं अपना लगेज ढूँढकर अपने कमरे में ले आईं।

बाथरूम में गर्म पानी आ रहा था। हाथ-मुँह धोकर तरो-ताज़ा हुई और बाकी सब से कहकर नीचे रसोई-घर में से चाय लेने चली गयी। वहाँ पता चला कि एलओ साहब भोजन-कक्ष में ही मीटिंग लेने वाले हैं। मैं वहीं जम गयी। धीरे-धीरे सभी इकट्ठे हो गए।

एलओ ने कल के कार्यक्रम के बारे में बताया कि बस का सफ़र यहीं तक था अब आगे मंगती तक तो जीप में जाएँगे, उसके आगे पैदल चढ़ाई शुरू होगी। जो यात्री पोनी और पोर्टर करना चाहते है वे उसी समय अपना नाम लिखवा दें। पुराने यात्रियों और एलओ द्वारा सलाह दी गयी कि पोर्टर तो सभी को हायर करना चाहिए, चढ़ाई में कठिनाई अनुभव करने वाले यात्री पोनी भी हायर कर लें। आने-जाने दोनों ओर के लिए पंजीकरण यहीं होगा, आगे सुविधा न मिलेगी। कु.मं.वि.नि. का निर्धारित ठेकेदार कल पंजीकरण-शुल्क ले कर रसीद दे देगा। एक तरफ़ की बाक़ी राशि भारत तिब्बत बॉर्डर पार करते समय दी जाएगी। पूर्ण भुगतान वापिस मंगती आने पर होगा।

बहुत देर तक इसी पर चर्चा चलती रही। कुछ लोग दो मिलकर एक पोनी और पोर्टर करना चाहते थे ताकि पैसे बचा सकें जो थकेगा वह पोनी पर बैठ जाएगा दूसरा पोर्टर के साथ चलता रहेगा। हम भी कुछ देर तक तो कंफ़्यूज़न में रहे क्या करें क्या न करें, फिर हमने एलओ से सलाह ली तो उन्होंने पोर्टर अपना-अपना करने की सलाह दी। हम सोचते रहे और लोगों की बात भी सुनते रहे। फिर अपने अकेले के लिए पोनी-और पोर्टर दोनों के लिए नाम लिखवा दिया। चर्चा लंबी चली थी।

लगेज के लिए भी कहा गया कि गाला में (अगला रात्रि विश्राम) लगेज नहीं मिलेगा। एक जोड़ी कपड़े साथ वाले बैग में रखें। फालतू सामान यहीं छोड़ा जा सकता है। आने पर वापिस मिल जाएगा। अधिक सामान न ले जाएँ। पच्चीस किलो सामान से अधिक न ले जाया जा सकेगा।

इस बीच भोजन भी लग गया था। सभी ने शिव-वंदना की और खाना खाया। हम अपने कमरे में चले गए। सुबह नौ बजे निकलना था। सो लगेज खोला एक जोड़ी कपड़े और निकाले अगली सुबह पहनने के लिए। अबतक पहने हुए कपड़ों का एक बैग (चारों ने मिलकर) अलग तैयार किया यहीं छोड़ने के लिए। पुनः पैकिंग करके भगवान का नाम लिया और सो गए।

- क्र्मशः

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