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03.16.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

Kailash

तीसरा दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

06/6/2010

सुबह आठ बजे मैं गुजराती-समाज के द्वार पर पहुँच गयी। बाहर बस खड़ी थी। सभी यात्री बस में बैठे हुए थे मैं लपककर बस में चढ़ गयी। पीछे जाकर सीट मिली। सभी को नमस्कार किया। बस चल पड़ी। सभी यात्री प्रफुल्लित और उत्साह से लबालब थे। उच्च-स्वर में ’ओम नमःशिवाय’ का उदघोष कर रहे थे। बस सड़कों पर दौड़ती हुई लगभग साढ़े नौ बजे अकबर-भवन पहुँच गयी। सभी यात्रियों की क़तार बनाकर, नाम पुकारकर और लिस्ट से मिलाकर हॉल में पहुँचाया गया। यात्रियों के रिश्तेदारों को बाहर ही रहने का आदेश दिया गया।

विदेश-मंत्रालय और कुमाऊं-मंडल के आधिकारी वहाँ पहले से ही उपस्थित थे। सभी यात्रियों को ठंडा पेय और चाय-बिस्कुट सर्व की गयी। इतने में ही हमारे एल.ओ. साहब भी हॉल में प्रवेश कर गए। कुमाऊं-मंडल और आईटीबीपी के अधिकारियों ने यात्रा की ब्रीफिंग की, साथ-साथ यात्रा संबंधी कठिनाइयों की जानकरी देते हुए उस समय भी किसी भी सदस्य को यात्रा रद्द करने की छूट दी।

इन्डेंमनिटी बोंड और फॉर्म इत्यादि भरवाए गए और शेष धन १९५०० रुपए भी लिया गया और रसीदें दीं। (सभी संलग्न प्रपत्र की भाषा-प्रारुप विदेश-मंत्रालय डाक द्वारा पत्र के साथ ही भेजता है।) सभी के पासपोर्ट वापिस किए ताकि लोग डालर खरीद सकें।

एलओ ने छः-छः यात्रियों के ग्रुप बनाए, सभी की इच्छा से अलग-अलग यात्रियों को कुछ-कुछ और काम सौंपे। हमारे ग्रुप में हम चार वे महिलाएँ थीं जो अकेली जा रहीं थीं और एक केरल से आए युगल (पति-पत्नी) थे। कुछ यात्री तो डालर का प्रबंध पहले से ही कर चुके थे, पर कुछ यात्रियों को डॉलर आज ही लेने थे, बस चलने में देर थी सो हम एलओ एवं अन्य सभी यात्रियों को बताकर लखनऊ की सहयात्री स्नेहलता और दिल्ली के श्री बिंद्रा जी के साथ दिल्ली के ही यात्री जुनेजाजी (जो पिछले चार बार से कैलाश-मानसरोवर की यात्रा पर जा रहे हैं) के कहने पर उनकी तवेरा में बैठकर आ गए। सभी अशोका होटल के सेंट्रलबैंक ऑफ़ इंडिया की शाखा में गए। विदेश-मंत्रालय ने इस बैंक की शाखा को कैलाश-मानसरोवर यात्रियों को रुपए से डालर बदलवाने हेतु हिदायतें दे रखी थीं। मुझे छोड़कर सभी ने बैंक की शाखा में विनिमय हेतु फार्म भरकर रुपए जमा कराए और डालर ले लिए। मैं कई दिन पहले ही इस शाखा से १३०० डालर खरीद चुकी थी।

स्नेहलताजी ने जब रुपए निकालने के लिए बैग खोला तो बोलीं कि उनके बीस हजार रुपए कहीं खो गए। पर कुछ ही क्षण में उन्हें याद आगया कि वे १९५०० रुपए कुमाऊँ-मंडल के पास भी जमा करके आयीं हैं। सभी बहुत हंसे। स्नेहलताजी से मज़ाक किया।

स्नेहलता जी रेलवेस्टेशन के गेस्टहाऊस में रुकी हुई थीं सो वह अपने पति के साथ रेलवे-स्टेशन पर और बिंद्राजी को लक्ष्मीनगर जाना था सो आइटीओ उतर गए। मैं कश्मीरी-गेट उतर गयी और वहाँ से मेट्रो-ट्रेन में घर आगयी।

घर पर बहुत काम थे। वहाँ पुराने यात्रियों ने बताया था कि सामान के दो नग बनाएँ। कभी-कभी सामान के थैले खच्चर की पीठ से नदी में गिर जाते हैं तो एक थैले का सामान तो सुरक्षित रहेगा। अभी तक तो हमने एक ही थैला बनाया था। अब पता चला तो दो में सामान लगाया। अच्छी-खासी पैकिंग खोलनी पड़ी और बड़ी मुश्किल से दोबारा पैक किया। दोबारा हड़बड़ी में कीगयी पैकिंग में याद भी नहीं था कि सामान कहाँ-कहाँ ठूंस दिया।J घर-बाहर सभी हितेषी मुझे आयोजन के साथ विदा करने जाने को आतुर थे, पर मैं बिना शोर-शराबे के जाना चाहती थी सो सभी को प्यार से मनाकर केवल अपनी बड़ी बहिन के साथ जाने का प्रोग्राम रखा।

उसी दिन शाम को साढ़े सात बजे दिल्ली-सरकार के राजस्व-विभाग की ओर से गुजराती-समाज में यात्रियों का विदाई-समारोह और भजन-संध्या का आयोजन था। सब काम करके हम नहा धोकर अपनी अग्रजा के साथ भजन संध्या में पहुँच गए। दिल्ली सरकार की तीर्थ-यात्रा विकास समिति के चैयरमैन श्री उदयकौशिक जी और एस.डी.एम राजस्व विभाग सामने स्टेज पर उपस्थित थे। दायीं ओर एक मेज पर भगवान गौरी-शंकर की मूर्ति विराजमान थीं जिन पर पुष्प-मालाएँ सुशोभित हो रहीं थीं। लोग बारी-बारी से आकर मूर्तियों पर तिलक लगा रहे थे और पुष्प समर्पित कर रहे थे। बायीं ओर एक बड़ी चौकी पर भजन गायक भक्ति रस फैला रहे थे। लोग मगन होकर तालियाँ बजा रहे थे, झूम रहे थे और नाच रहे थे। बहुत सुंदर समां बाँधा गया था।

कुछ देर में हमारे एल.ओ. आ गए और उदयकौशिक जी के बराबर मंच पर बैठ गए। कुछ संबोधन और भाषण हुए। भगवान शंकर की आरती हुई। इसके बाद सभी यात्रियों का दिल्ली सरकार की ओर से स्वागत किया गया। सभी को फूलमाला पहनायी गयीं। एक ट्रैक-सूट, एक बरसाती सूट और एक ट्रैवल-बैग (रकसक) जिसमें एक टार्च और एक डिब्बे में पूजा का सामान था तथा एक सफेद टोप भी भेंट किया गया। स्मरण रहे दिल्ली-सरकार अपने राज्य से जाने वाले प्रत्येक कैलाश-मनसरोवर यात्री को पच्चीस हजार रुपया सब्सिडी भी देती है। छुट्टी का दिन होने के कारण हम चारों यात्रियों को यह रक़म यात्रा से वापिस आने पर मिली।

अब बारी थी भोजन की। सभी ने सुस्वादु भोजन का आनंद लिया। चूंकि लगभग यात्रीगण वहीं ऊपर रुका हुआ था सो कुछ-कुछ करके लोग जाते जा रहे थे। मैं, जुनेजा और बिंद्राजी हम तीनों स्थानीय यात्री अगले दिन सुबह ही वहाँ पहुँचने वाले थे। कल मैंने टिंक्कू और उसकी पत्नी को भी भजन-संध्या का आनंद लेने के लिए बुलाया था, पर वे दिल्ली के ट्रैफ़िक-जाम में फंस गए थे, कुछ देर में वे लोग आगए। उन्होंने अर्चना की और प्रसाद लिया और मेरे साथ चल पड़े। चलते-चलते मैंने जुनेजाजी से पूछा कि अगले दिन सुबह किस समय तक पहुँच जाएँ तो उन्होंने मुझे साढ़े चार बजे तक पहुँ जाने के लिए कहा। क्योंकि सभी लगेज वाला ट्रक पहले ही रवाना हो जाता है इसलिए हमें थोड़ा जल्दी पहुँचना था। मैं जल्दी पहुँचने की हाँ करके घर आ गयी।


- क्र्मशः

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