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03.01.2014


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)

Kailash

दूसरा दिन - कैलाश-मानसरोवर यात्रा

05/6/2010

आईटीबीपी बेस हॉस्पिटल पहुँचने का समय नौ बजे था। अस्पताल घर से बहुत दूर दिल्ली के एक कोने में तुगलकाबाद के पास था। मैं अपनी यात्रा का सारा काम अपने आप करना चाहती थी सो अकेली चल पड़ी। ऑफ़िस-टाइम होने के कारण हर जगह ट्रैफ़िक जाम था। मैं साढ़े दस बजे मदनगीर पहुँची। देर हो जाने के कारण हड़बड़ाहट हो रही थी। जैसे-तैसे अस्पताल के मुख्य द्वार पर पहुँची। एक तो अस्पताल बहुत बड़ी जगह में है दूसरे अनजान थी, कोई संकेतक हमारे संदर्भ हेतु नहीं था। वहाँ से अभीष्ट स्थान पर पहुँचने में लगभग दस मिनट लग गए।

भागकर जब सब यात्रियों के पास पहुँची तो पता चला कि सुविधा हेतु यात्रियों के छोटे-छोटे समूह बना दिए गए थे और अलग-अलग कमरों में डॉक्टर्स एक-एक को बुलाकर कुछ जाँच के साथ-साथ कल की जाँच-रिपोर्टों के आधार पर अंतिम रिपोर्ट दे रहे थे। पूछते-पूछते मुझे मेरा समूह मिला। एक सदस्य मेरी फाइल संभाले हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे। फाइल लेकर मैं उस कक्ष के आगे पड़ी बैंच पर बैठ गयी जिस में मुझे बुलाया जाना था।

अभी बैठी-बैठी अन्य सह यात्रियों से बात कर ही रही थी कि किसी यात्री ने बताया कि हमारे एल०ओ० साहब भी आए हुए हैं। तभी एक युवा मेरे पास वाली सीट पर आकर बैठ गए और मुझसे मुखातिब होकर बोले- माईसेल्फ़ मनीष गर्ग, एल०ओ० सैंकेण्ड बैच। व्हाट्स यॉर गुड नेम? मैंने अपना नाम बताया। इसके बाद उन्होंने मेरे पर्वतारोहण के बारे में अन्य प्रश्न भी पूछे।
एल०ओ० साहब अभी पूछ ही रहे थे कि अन्य यात्री भी आगए और अपना परिचय देने लगे। हंसी-मज़ाक का माहौल बन गया।

ऊपर पहली मंजिल पर खाने का प्रबंध था। जिन यात्रियों की रिपोर्ट मिलती जा रही थी वे सब ऊपर जाकर भोजन कर रहे थे। थोड़ी देर में मेरा नंबर आया। एक डॉ०साहिबा हमें देख रही थीं। उन्होंने मेरा रक्तचाप देखा जो बिल्कुल ठीक था पर कल की रिपोर्ट में उन्हें कुछ असमंजस्य था तो उन्होंने किन्हीं अन्य डॉक्टर से फोन पर बात की और फाईल लेकर उनके पास भेज दिया। मैं लपकी उनके कक्ष की ओर। हाथ में फाइल और तेज क़दम। धड़कन तेज हो गयी। पता नहीं डॉ० साहब क्या कहेंगे! दुविधामय घबराहट न जाने क्या-क्या?

पूछकर अंदर गए। डॉक्टर ने पेपर्स देखे और ओके कर दिया। मेरे चिंतित मन को इतनी खुशी हुई कि आँखें हल्की सी नम हो गयीं। डॉ० साहब ने यात्रा की शुभकामनाएँ दीं और बाहर भेज दिया। मैं बाहर आयी तो लोगों ने आँखें देखकर समझा कि मैं फेल हो गयी, पर शीघ्र ही सबको पता चल गया कि मैं उनके साथ जा रही थी।

ऊपर खाना खाने गए। भटिंडा की प्रायवेट सेवा-संस्था की ओर से भोजन का आयोजन था। वे बड़े आदर से साथ ले जा रहे थे। स्वयं हाथों से खाना परोस रहे थे और झूठी थालियाँ भी उठाने को तैयार थे, ये अलग बात है कि हमने उन्हें मौक़ा नहीं दिया। उस संस्था ने यात्रियों को एक-एक बैल्ट-पाउच भी भेंट किए। बेंत भी दिए थे जिन्हें एक साथ गुजराती समाज पहुँचा दिया था ताकि एकसाथ बस में ले जाए जा सकें कोई अलग रखकर भूल न जाए।

अभी सब लोग खा-पी रहे थे कि बताया गया कि सभी यात्री सभा-कक्ष में एकत्र हो जाएं, एल०ओ० साहब मीटिंग लेंगे। धीरे-धीरे सभी लोग एकत्र हो गए। तभी पता चला कि कुछ लोगों का दुबारा टेस्ट हो रहा है। उनमें एक राजस्थानी दंपत्ती भी थे, जिनकी पत्नी तो योग्य थीं पर पति मधुमेह से बहुत अधिक पीड़ित थे और भी कई यात्री जिनमें हमारे ग्रुप की कर्नाटक से आयीं सदस्य थीं, अभी जाँच से गुजर रहे थे। उनकी रिपोर्ट आनी थीं।

सभी सभा-कक्ष में एकत्र होगए। सभा-कक्ष को देखकर पता चल रहा था कि यह फ़ौजी-कक्ष है। बड़ी और लंबी मेज के चारों ओर कुर्सियाँ लगीं थीं। सभी आते गए और बैठते गए। एल०ओ० ने सभी को शुभकामनाएँ दीं और जो लोग पहले भी जा चुके थे उन लोगों से बातचीत के आधार पर कमेटियाँ बनायीं और कार्य-भार सौंपे। वह तो अगले दिन मिलने की कहकर चले गए। तभी एक प्रायवेट संस्था के अध्यक्ष श्री गुप्ता जी आए। उन्होंने यात्रियों की सुविधा हेतु कुछ सामान देने की पेशकश की जिसे सभी ने विनम्रता से स्वीकार कर लिया वे सामान की लिस्ट पढ़कर सुनाकर और देकर चले गए।

चूँकि कुछ यात्रियों की मेडिकल-रिपोर्ट अभी भी आनी शेष थीं इसलिए सभी यात्री उसी कक्ष में बैठे उनका इंतजार कर रहे थे।

समय बिताने के लिए सभी ने अपना-अपना विस्तृत परिचय देना शुरु किया। हरेक यात्री ने अपना काम-व्यवसाय और शौक इत्यादि बताए साथ ही अपने पर्वतारोहण के अनुभव भी बाँटे। ऐसे करते-करते सभी यात्रियों की रिपोर्ट्स मिल गयीं। हमारे बैच में से दो यात्रियों को चिकित्सीय-जाँच में अयोग्य पाया गया। उस समय यह निश्चित हो गया कि हमारे बैच में केवल ४८ यात्री ही जाएँगे।दल में सबसे अधिक आयु तिहत्तर साल के श्री बंसल जी और अमर सबसे छोटे अट्ठारह साल के थे।

राजस्थानी परिवार की उन महिला ने फिट होने पर भी अपने पति के न जाने के कारण अपना जाना भी रद्द कर दिया। वह बहुत उदास हो गयीं थी और रो भी बहुत रहीं थीं। सभी ने उन्हें यात्रा पर चलने की सलाह दी, उनके पति भी उनसे जाने के लिए कह रहे थे, पर वह न मानीं। एक रिटायर्ड व्यक्ति भी अयोग्य माने गए थे। सभी यात्री बस में बैठकर गुजराती-समाज की ओर चल पड़े। लगभग सात बजे वहाँ पहुँच गए। दो दिन में ही यात्रियों से मेल-मिलाप बढ़ गया था। महिला-यात्रियों ने साथ चलकर चाय पीकर जाने का अनुरोध किया जिसे मैंने मान लिया और मैं भी गुजराती-समाज के गेट में प्रवेश कर गयी। तीसरी मंजिल पर बड़े से कक्ष में सभी यात्री ठहरे हुए थे। रेलवे के डिब्बे की तरह ऊपर-नीचे बिस्तर लगे हुए थे।

मैंने नीचे आकर चाय पी और सहयात्रियों से विदा लेकर और कल विदेश-मंत्रालय के अकबर-भवन के अनारकली हॉल में मिलने का वायदा किया।

सुबह ऑटो-रिक्शा में अस्पताल पहुँचने में काफ़ी परेशान हुयी थी। गुजराती-समाज मेरे घर से बहुत दूर नहीं था सो मैंने सोचा मैं बस में ही सभी यात्रियों के साथ चली जाऊंगी। इस हेतु कुमांऊ-मंडल के कर्मचारी श्री दीवानजी को मैंने बता दिया था कि कल सुबह वह मेरी प्रतीक्षा करें मैं भी सभी के साथ अकबर-भवन बस में ही जाऊंगी। मेट्रो ट्रेन में बैठकर घर आगयी।

घर आकर सभी नजदीकी लोगों को अपनी यात्रा के पक्के होने की सूचना दी। अस्पताल से ही बार-बार सभी के फॉन आ रहे थे और एसमएस आ रहे थे । शुभकामनाओं का तांता लग गया था। अपने परिवार और आसपास के लोगों में मैं ही श्री कैलाशधाम के दर्शन करने जाने वाली पहली तीर्थयात्री थी।


- क्र्मशः

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