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06.03.2012


अद्भुत है अलौकिक है वहाँ जाना
(कैलाश-मानसरोवर यात्रा)
पहला दिन
04/6/2010

Kailash

पहला दिन
04/6/2010

चार जून आ गयी। सुबह आठ बजे खाली पेट ’दिल्ली हार्ट एंड लंग्स इंस्टीट्यूट’ पहुँचकर रिपोर्ट करनी थी, सो मैं उत्साह और साहस से भरपूर परिवार के किसी भी सदस्य को साथ लिए बिना हुए जल्दी घर से निकल पड़ी। जल्दी इतनी कि ऑटो-रिक्शा में किराया पूछे बिना बैठ गयी और ढूँढ-ढाँढ कर अस्पताल पहुँच गयी। वहाँ मुझसे पहले ही हमारे दल के सभी यात्री प्रतीक्षा-कक्ष में बैठे हुए थे। मैं हड़बड़ी में थी। मुझे लगा कि देर हो गयी है। (अन्य स्थानों से आए सभी कैलाश-मानसरोवर यात्रियों को कुमाऊँ-मंडल और दिल्ली सरकार गुजराती-समाज में ठहराते हैं।) कुमाऊँ-मंडल के कर्मचारियों द्वारा वे सब एक बस में हार्ट-इंस्टीट्यूट लाए गए थे। यहीं पर पहली बार अपने सहयात्रियों (दल के सदस्यों) से मेरा परिचय हुआ। मैंने अस्पताल जाँच-प्रक्रिया के बारे में दल के सदस्यों से बातचीत की।
अस्पताल के युवा कर्मचारी बड़ी मृदु-वाणी में सौहार्द्रपूर्ण ढंग से यात्रियों के नाम पुकार कर बुला रहे थे। सभी को पहचान हेतु एक रीबन बांधने को दिया गया था।

एक ओर अस्पताल के कर्मचारी एक फार्म भरवा रहे थे जिसमें हमारी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी भरनी थी साथ ही २१०० रुपए फीस भी जमा करनी थी और बैठकर अपने नंबर की प्रतीक्षा करनी थी तो दूसरी ओर कुमाऊँ-मंडल के अधिकारी हमारे पासपोर्ट और वीज़ा-शुल्क दौ सौ रुपए एकत्र कर रहे थे।

अस्पताल में मूत्र और रक्त की जाँच के अलावा ई.सी.जी., ट्रेडमिल टेस्ट जैसी जाँच भी हुईं। मुझे हवा फूँकने में थोड़ी दिक्कत रही। डॉ. साहब ने कहा कि मेरा ५०० रुपए अतिरिक्त शुल्क देकर पी.एफ.टी. होगा। करते-करते ग्यारह बज गए। खाली पेट में चूहे कूद रहे थे। मुझे पता चला कि उस टेस्ट के लिए खाली पेट की आवश्यकता नहीं होती। बस मैं भागी नाश्ता खाने। अस्पताल की केंटीन में टोकन लेकर नाश्ते की व्यवस्था थी। चाय-सेंडविच इत्यादि। भूखे हो तो कुछ बुरा नहीं लगता। वैसे नाश्ता अच्छा था। उसके बाद पी.एफ.टी. टेस्ट के लिए गयी तो वहाँ अन्य कई सह-यात्रियों को लाईन में लगे देखा। बाद में सभी पास हो गए।

अभी डॉक्टर से मीटिंग होनी थी और लंच भी करना था। सभी यात्री आकर एक बड़े हॉल में बैठ रहे थे। हम महिलाएँ एक दूसरे से ऐसे बातें कर रहीं थीं जैसे बहुत पहले से एक दूसरे को जानते हों। सभी यात्रा में ले जाने वाले खाने के सामान और कपड़ो के विषय में सुझाव दे और ले रहे थे।
अस्पताल की डाइरेक्टर ने एक-एक यात्री को बुलाकर अस्पताल के स्टाफ़ के व्यवहार के बारे में मौखिक और लिखित फीडबैक लीं। जब मैं अंदर गयी तो मेरी हिंदी बोली से निदेशक महोदया इतनी प्रभावित हुयीं कि मुझसे हिंदी में ही अपना फीडबैक देने का अनुरोध किया जिसे मैंने सहर्ष स्वीकार कर लिया और अपनी बात प्रभावशाली ढ़ंग से लिखी। पढ़कर डॉ. साहिबा बहुत खुश हुईं और ’ऊँ नमःशिवाय’ कहकर यात्रा हेतु शुभकामनाएँ दीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि अस्पताल के स्टाफ का व्यवहार अति मृदुल और कहीं अधिक सहयोगी था।

कुछ देर में हम सभी को एक बड़े कमरे में लेजाया गया। यहीं दोपहर का खाना अस्पताल के तीमारदार कक्ष (जहाँ मरीजों के रिश्तेदार रुक सकते और आराम कर सकते थे) में दिया गया। थर्मोकोल की पैक्ड थालियाँ थीं। दाल-रोटी, सब्जी,चावल और रायता सभी कुछ। सभी बहुत भूखे थे सो टूट पड़े खाने पर।

खाना खाने के बाद कॉनफ़्रेंस रूम में दो डाक्टरों ने संबोधित किया। पर्वतारोहण के समय होने वाली स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से सावधानी बरतने और रोग-संबंधी जानकारी दी। जो दवाइयाँ अपने साथ ले जानी थी उनकी जानकारी दी। कुछ पावर-पाइंट प्रस्तुति भी दी। शाम को मैं सभी तीर्थयात्रियों के साथ बस में बैठकर कश्मीरी-गेट आ गयी। कश्मीरी-गेट से मेट्रो-ट्रेन में बैठकर घर आ गयी।

अगले दिन सुबह मदनगीर में भा.ति.सी.पु. के अस्पताल में बुलाया गया था। वह जगह मेरे घर से बहुत दूर थी।

क्रमशः --


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