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| 10.22.2007 |
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सुन बे,
रक्तचाप! डॉ. प्रेम जनमेजय |
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श्रीमान मुख्तयार सिंह मेरे लिए टू इन वन हैं --- मेरे मित्र हैं और
पड़ोसी भी हैं। यह लगभग वैसे ही है,
जैसे
कबीरदास की बात मानकर,
मैंने
महँगाई इस के जमाने में बिना पानी और बिना साबुन खर्च किए,
अपना
स्वभाव निर्मल करने के लिए अपनी पत्नी को अपने घर में रखा हुआ है। कबीर
ने तो इस काम के लिए आँगन में पत्नी को बाँधने की बात कही है,
पर मै
क्योंकि नारी जाति कर प्रबल समर्थक हूँ,
इसलिए
अपने घर में उसे छवा रखा है । (पत्नी की कुटिया मेरे घर में नहीं छवेगी
तो क्या मुख्तयार सिंह के यहाँ छवेगी?)
मैं
पत्नी और निंदक को पर्याय इसलिए मान रहा हूँ क्योंकि जैसे प्रजातंत्र
में विरोधी दल से बड़ा कोई निंदक नहीं हो सकता वैसे परिवार की संसद में
पत्नी से महान निंदक नहीं हो सकता है।
मेरी पत्नी मेरे लिए
’टू
इन वन’
ही
नहीं,
’कई
इन वन’
है।
बात
हो रही थी मुख्तयार जैसे सिंह की और बीच में आ गई पत्नी जैसी
........... (इस रिक्त स्थान की पूर्ती के लिए,
अपने
साहस बल और औकात को देखते हुए आप ही उपमा की तलाश करें। मैंने कालीदास
से अनुरोध किया था पर वह भी टाल गए। किसी मंचित कवि से लिफाफात्मक
अनुरोध करता तो वह ऐसी वह ऐसी उपमाएँ प्रस्तुत करता कि .....) इसमें न
तो कसूर मुख्तयार सिंह का है और न पत्नी का,
सारा
कसूर हम हास्य व्यंग्य के लेखकों का है,
पत्नी
बिना हमारी रचनाओं में हास्य आता ही नहीं है। साली और पत्नी की कमाई
खाने वाले हास्य सम्राटों के समक्ष मैं दीन-हीन,
एक
रचना के कभी - कभी सौ दो सौ पा जाने वाला,
तुच्छ
व्यंग्यकार,
अपने
को शामिल नहीं मानता हूँ
तो क्या,
पर
हास्य व्यंग्य का तमगा लगाए मैं आज तक औरों के साथ
दूसरों पर व्यंग्यात्मक मुस्कान बिखेरता ही आया हूँ । सोचा इस
सुअवसर पर स्वयं पर भी हँसने का साहस कर लूँ।
मुख्तयार नाम का सिंह है परन्तु हकीकत में कन्या है। उम्र छप्पन की है
और जैसे हमारे देश का प्रजातंत्र छप्पन का होने के बावजूद देश चलाने की
नौटंकी करने वालों के समक्ष,
सहमा
- सहमा दिखाई देता है,
वैसा
ही मेरा मित्र मुख्तयार है। सारे जहाँ का दर्द लोगों के जिगर में होता
है,
मुख्तयार के जिगरे में वहम
है। किसी ने किसी बीमारी का नाम लिया नहीं,
किसी
अखबार में बीमारी के लक्षण मुख्तयार ने पढ़े नहीं,
कि हो
गया शुरू प्यार का गीत ---
’जरा
सी आहट होती है तो दिल यह सोचता है,
कहीं
यह वो तो नहीं।’
हकीम
लुकमान ने इन्हीं मुख्तयार को देखकर वहम की दवा ईजाद करने से तौबा की
होगी।
तो
हुआ यूँ कि हमारे यह सिंह दुनियादारी निभाने के लिए दूर के बीमार चाचा
को देखने चले गए। चाचा सीने में दर्द के कारण भरती हुए थे। चाचा तो
सीने का दर्द ठीक करवाकर उसी दिन घर चले गए पर हमारे शेरे हिंद ने सीने
को पकड़ - पकड़ कर दर्द करवा ही लिया। जब तक दर्द हो नहीं गया इन्हें
लगा ही नहीं कि वह सीने में दर्द वाले किसी रोगी को देखकर आए हैं। रात
भर पत्नी से जगराता करवाया और सुबह मुझ हितचिंतक को निमंत्रण भिजवा
दिया कि पड़ोस धर्म निभाना हो,
सुबह
- सुबह एक नेक काम करना हो,
तो आ
जाओ।
डाक्टर द्वारा छह सात टैस्ट करवाने और हजार बारह सौ का चूना लगवाने के
बाद यह महारथी इस वहम को छोड़ अगला वहम
पालने के लिए तैयार हो गया। मुख्तयार ने तो नमाज पढ़ ली पर रोजे
मेरे गले पड़ गए। लोग बहती गंगा में हाथ धोते हैं,
मैंने
बहती गंगा में अपना बल्ड
प्रेशर नपवा लिया। बहुत पछताया। डाक्टर ने नापा और बोला कि ब्लड प्रेशर
तो हाई है। आज तक अध्यापक बनकर छात्रों का टेस्ट लेता आया हूँ,
अब
डाक्टर की नेक सलाह पर मुझे करवाने थे। मुख्तयार सिंह दे चुके परीक्षा
अब है मेरी बारी। लिपविक प्रोफाईल,
बल्ड
शुगर और ना जाने कैसे कैसे भारी भरकम नामों के ही नहीं दामों वाले
टेस्ट। उसके ऊपर से यह खाना है और यह नहीं खाना है कि मुफ्त सलाह।
घर
पहुँचते ही मित्र ने
पड़ोसी धर्म निभाते हुए मेरी पत्नी को
सूचना दी। (ऐसी सूचनाओं को भाषा ज्ञानी
चुगली कहते हैं। खैर मेरे मित्र ने जो भी किया मेरी पत्नी ने
उसको गहरी श्रद्धा से ग्रहण किया। वैसे भी कहा जाता है कि चुगली और
नारी का संबंध वैसा ही है जैसे आत्मा और परमात्मा का।) मैं तो पास हो
गया और यह फेल हो गया के अंदाज में मित्रवर ने मेेरे बल्ड प्रेशर और
डाक्टर की सलाहों का ऐसा चित्र खींचा कि पत्नी ने तत्काल मेरा
वानप्रस्थ आश्रम घोषित कर दिया। सादा जीवन और उच्च विचार का नारा जिस
महान पुरुष ने दिया है वह अवश्य ही उच्च रक्तचाप से पीड़ित रहा होगा।
जैसे
वन जाते समय सीता ने राम के साथ जाने की जिद की थी वैसी ही जिद मेरी
पत्नी टेस्ट रिपोर्ट डाक्टर को दिखाने के जाते समय की। मैं नहीं चाहता
था कि वह मेरी कमजोरियों को जाने,
पर
पत्नी की जिद के सामने राम जैसा पुरुषोत्तम हार गया था तो मेरा हारना
निश्चित ही था। यह शुक्र था कि लक्ष्मण सिंह ने चलने की जिद नहीं की
वरना मैं अभिमन्यु ऐसे चक्रव्यूह में फंसता कि ......।
डाक्टर ने बताया कि क्लोस्ट्रोल बढ़ा है इसलिए तला बंद,
नमक
कम,
वजन
कम,
चिंता
कम,
और जो
भी अधिक है वही कम कम। एक बल्ड प्रेशर ने कमी का जो दौर चलाया उसके
सामने बड़ी से बड़ी बाजार की तेजी के कारण उपजी मंदी
कम है।
आप तो
जानते ही हमारा देश सलाहकारों का देश है। यहाँ सलाह मुफ्त मिलती है और
बिन माँगें मिलती है। चाहे खुद को बैट ढंग से पकड़ना न आता हो वह सचिन
तेंदुलकर को सलाह देता है कि उसे कौन सा शॉट कैसे लगाना चाहिए। चाहे घर
का बजट न सम्भलता हो पर वित्त मंत्री को बजट पर सलाह देने वालों की कमी
नहीं है। चाहे दस लोगों के सामने बोलते हुए अपनी जुबान लड़खड़ा जाए पर
चुनाव में अटलबिहारी वाजपेयी को कैसे बोलना चाहिए,
सोनिया गांधी की हिंदी कैसी होनी चाहिए पर हर चौराहे पर सलाह देने वाले
मिल जाते हैं। ऐसे ही सलाहकारों ने मुझे घेर लिया। सुधीर ने रोज पाँच
किलोमीटर ब्रिस्क वाकिंग,
वाईन
और फिश की सलाह दी। चोपड़ा ने के.पी.सी. की गोली खाने की सलाह दी। यह
के.पी.सी. क्या है ! यह के.पी.सी. क्या है ! --- के से खाओ,
पी से
पिओ और सी से चाँदनी रात में मजे करो। अखिलेश ने कहा कि लहसन की पाँच
कलियाँ रोज खाओ। कुलदीप अहूजा ने होम्योपैथिक रौलफिया सरपनटीना की दस
बूँदें लेने की सलाह दी। भाटिया ने कहा कि सूखे आँवले और मिश्री का
चूरण चैत्र मास में इक्कीस दिन खा लूँ। सो जिसकी जैसी भावना रही उसने
बल्ड प्रेशर मूरत देखी वैसी। सबसे बढ़िया सलाह दी कपूर ने दी -- किसी की
सलाह न मानो।
खाने
पीने की इतनी वर्जनाओं और बिन माँगी सलाहों के कारण मुझे लगा जैसे मैं
महाभारत का अर्जुन हूँ जिसके सामने कुरुक्षेत्र का मैदान मुँह फाड़े
खड़ा है। किसी रथ पर राजनेता के त्रिकोणीय व्यक्तित्व - सा समोसा बैठा
है,
किसी
पर,
मुव्किल को अपनी ओर न्यायरक्षक - सा ललचाता काला गुलाबजामुन विराजमान
है,
किसी
पर राजनेता और नौकरशाह के चमचे-सा बटर चिकन है। वो देखो उस रथ पर श्वेत
वस्त्र धारण किए ट्रैफिक पुलिस - सा रसगुल्ला अपनी छटा बिखेर रहा है।
हे सखि,
उधर
तो देख,
निर्मोही हलवाई कैसे जलेबी को किसी नेता के व्यक्तित्व - सा आड़ा -
तिरछा करता उसमें चाशनी
इंजेक्ट कर रहा है। और मैं,
निर्मोही अर्जुन भारतीय
जनता- सा क्लीव,
हथियार डाले बैठा हूँ ! हे मेरे कृष्ण,
कहाँ
हो तुम?
हे
माखनचोर मेरा माखन कहाँ है?
हे
रासबिहारी मेरा रास कहाँ है?
हे
प्रधानमंत्री,
मेरा
मंत्रालय कहाँ है!
किसी
को समोसा,
कचोरी
खाते देखता हूँ तो अपना जीवन व्यर्थ बहा -बहा लगने लगने लगता है। लगता
है जैसे सारा पौरुष समाप्त हो गया है। अपनी मर्दानगी को हकीमों की भस्म
पर बनाए रखने वाले राधेलाल को जब बल्ड प्रेशर का रोग हुआ तो उसने भी
डाक्टर की सलाह और पत्नी के दबाव में दवा लेनी शुरू कर दी पर जब एक
मर्द मित्र ने कान में फुसफुसाया कि ब्लड प्रेशर की दवा मर्दानगी कम
करती है,
तो उस
मर्द ने दवा बंद कर दी। अब चाहे सर फूटे या माथा। मर्द राधेलाल ने मुझे
भी सलाह दी कि मैं वैद्य जी की भस्म खाऊँ और घर में सादा जीवन उच्च
विचार चाहे रखूँ बाहर निकलते ही नीच हो जाऊँ। खाने पीने और ऐश करने के
लिए बाजार भरे हुए हैं। सच्चा मर्द राधेलाल की तरह ही होता है,
उसकी
मर्दानगी घर के बाहर ही नजर आती है। पत्नी को धोखा देना पति की सबसे
बड़ी मर्दानगी होती है।
वह रवीन्द्र कालिया की तरह
’गालिब
छुटी शराब’
नामक
मंत्र का जाप नहीं करता है।
कुछ
लोगों को अपना पेट छिपाने की बीमारी होती है। ऐसे ही हमारे मित्र
घनश्याम हैं। आपको क्या है,
उसकी
सारी जानकारी आपके कंधे पर अपना हाथ रखकर ले लेंगे,
आप से
बातों की ऐसी उल्टी कराएँगे कि आपका सबकुछ बाहर आ जाएगा परन्तु खुद का
हाजमा ऐसा रखेंगे कि आप लाख सर पीट लें,
कुछ
नहीं उगलेंगे। घनश्याम को जब पता चला कि मुझे ब्लड प्रेशर हो गया है तो
मुझ सहयात्री के सामने रहस्य खोला कि मुझे तो सात साल से है। अपनी उम्र
के जिस महापुरुष को बताता हूँ,
वही
अपनी कोई न कोई ऐसी बीमारी से मेरा परिचय करवा देता है। लगता है जैसे
दिल्ली में उच्च रक्तचाप का कोई वॉयरस फैला हुआ है।
इसलिए ही शायद संतों ने गा - गाकर कहा है कि
सावन के अंधे को हरा नजर आता
है तथा राजनीति के अंधे को भ्रष्टाचार। इस उच्च रक्तचाप ने जितनी आह दी है उतनी ही वाह भी दी है। चलो अपने नीच जीवन में कुछ तो उच्च निकला। अमीरी नहीं तो क्या, अमीरों की बीमारी तो है। घर में मैं छुई - मुई का पौधा हो गया हूँ। जैसे पत्नी बोन चाईना की क्राकरी का ध्यान रखती वैसे ही मेरा पूरा ध्यान रखती है। मुझे गुस्सा न आए, मेरे सामने घर की समस्या न लाई जाए, समय पर मुझे खाना मिले आदि आदि। बाहर के लिए न सही घर के लिए मैं वी.आई.पी .हो गया हूँ। मै सोचता हूँ कि निराला की ’सुन बे गुलाब’ की तर्ज पर ’सुन बे रक्तचाप’ कविता लिखकर कवि ही बन जाऊँ। लोग किसी के प्यार में कवि बनते हैं मैं अपने रक्तचाप में बन जाता हूँ। |
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