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| 02.02.2008 |
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मुझे सी.डी. चाहिए, पापा! (साभार - डूबते सूरज का इश्क) डॉ. प्रेम जनमेजय |
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राधेलाल दफ्तर से घर लौटा तो उसके माथे पर इन्कम टैक्स की चिंतारेखा
खेल रही थी, चेहरा पे-कमीशन की रिपोर्ट न आने के कारण भ्रष्टाचार
शिरोमणि को रिश्वत न मिल पाने-सा बुझा हुआ था और हाथ में पकड़ा ब्रीफकेस
क्रन्दन कर रहा था कि किस कंगले के हाथ पड़ा हूँ जिसमें जूठे टिफिन
बॉक्स के अलावा कुछ नहीं है, काश किसी स्मगलर के हाथ में होता। चाल उसी
गर्भिणी-सी भयभीत थी जो आशंकित होती है कि दो लड़कियों के बाद इस बार भी
लड़की न हो। जूते मानवीय मूल्यों से गर्द खाए मटमैले हो गए थे।
राधेलाल ने घर में प्रवेश किया तो उसकी पत्नी ने कहा –
“आप
आ गए!”
पत्नी का स्वर ऐसा था जैसे दूरदर्शन पर समाचार-वाचक ने औपचारिक नमस्कार
किया हो अथवा गवाह ने गीता पर हाथ रखकर कसम खाई हो।
राधेलाल ने सिर हिलाया और अपने शरीर से दफ्तर को अलग करने की प्रक्रिया
में ब्रीफकेस को पलंग पर फेंका, बिना तसमे खोले जूते उतारे और पैंट
कमीज का मोह त्याग कर बनियान-पायजमा पहन लिया। बनियान-पायजामा या
बनियान-लुंगी हमारी घरेलू राष्ट्रीय ड्रेस है। इसमें व्यक्ति भारतीय
लगता है। मेरा सुझाव है कि जनता में भारतीयता की चेतना लाने के लिए
सरकारी दफ्तरों में इस ड्रेस का पहनना अनिवार्य कर दे। इससे सादगी
बढ़ेगी और वातावरण सुंदर होगा। इससे घर और दफ्तर के बीच की दूरी भी
समाप्त हो जाएगी।
राधेलाल ने बसों के धुएँ से शृंगारित श्यामल चेहरे से काल पाउडर ऐसे
उतारा जैसे टी.वी. प्रोग्राम समाप्त होने पर आर्टिस्ट मेकअप छुड़ाता है,
खाँ...खाँ... करके गले को ऐसे साफ किया जैसे शास्त्रीय गायन के लिए
तैयारी की हो।
राधेलाल शाम की चाय पीने के लिए ऐसे तैयार था जैसे अध्यक्ष माल्यार्पण
करवाने के लिए तैयार होता है। शाम की चाय का हमारे जीवन में बहुत महत्व
है। इस समय पति-पत्नी के बीच उच्च स्तरीय वार्ता संभव हो पाती है और
पूरे दिन में पति ने दफ्तर में क्या तीर चलाए इसका वीरगाथा पाठ हो सकता
है।
राधेलाल ने चाय को हाथ में पकड़ा ही था कि उसके बेटे ने दालभात में
मूसलचंद की तरह प्रवेश किया। बेटा बोला,
“आप
मुझे सी.डी. प्लेयर लेकर देंगे कि नहीं?”
स्वर में प्रश्न कम पाकिस्तानी धमकी की गूँज अधिक थी। पिछले कुछ दिनों
से बेटे ने सी.डी. प्लेयर की रट लगाई हुई है। पाकिस्तान की तरह बेटा भी
यू.एन.ओ. में सवाल उठाता रहता है।
राधेलाल ने टालने वाले स्वर में कहा,
“देखेंगे...”
राधेलाल के इस सरकारी टरकाऊ शब्द को सुनकर बेटे की रगों में खून खौला
और उसकी जवानी ने उससे संवाद बुलवाया,
“आप
जिंदगी में इसलिए कभी कुछ नहीं कर पाए, क्योंकि आपने सिर्फ देखा, कुछ
किया नहीं।“
राधेलाल ने महसूस किया कि जमाना बहुत बदल गया है, वैसे तो राधेलाल ने
अपने पिता के सामने जुबान खोलने की हिम्मत ही नहीं की होती, यदि की भी
होती तो अब तक वह करारा झापड़ पड़ता कि दिन में तारे नजर आ जाते। परंतु
राधेलाल की पीढ़ी का दुर्भाग्य यह है कि वह अपने पिता से भी पिटती रही
और आज अपने बेटों से पिट रही है। ऐसा पिटा हुआ आदमी केवल शर्मिंदा ही
हो सकता है, अतः राधेलाल ने भी शर्म से गर्दन झुका ली और बोला,
“यह
बात नहीं है... बात यह है कि बेटा अभी हम इतना पैसा खर्च नहीं कर
सकते...”
“यानी
हम इतने गरीब हैं कि एक सी.डी. प्लेयर तक नहीं खरीद सकते।“
पुत्र ने पिता का संवाद अपने तरीके से पूरा किया।
पुत्र
ने पिता के अहं पर सीधी चोट की थी। आज का पिता यह मानने को तैयार नहीं
है कि वह अपनी संतान का पालन-पोषण सही तरह से नहीं कर सकता, उसकी इच्छा
पूरी नहीं कर सकता।
राधेलाल बोला,
“नहीं,
यह बात नहीं है। तुम जानो फरवरी का महीना है न.. इसमें इंश्योरेंस
प्रीमियम...यूलिप का प्रीमियम...इन्कमटैक्स के लिए इंतजार करना पड़ता है
न इसलिए...वैसे भी तुम्हारी मार्च में परीक्षाएँ आ रही हैं...सी.डी.
प्लेयर तुम्हें डिस्टर्ब करेगा...”
“पापा...मुझे
कैसे पढ़ना है मैं जानता हूँ...म्यूजिक के बिना मुझसे पढ़ाई नहीं हो सकती
है...”
“पर
तुम्हारे पास इतना अच्छा म्यूजिक सिस्टम है तो...”
“पर
उसमें कैसेट प्लेयर है... मुझे सी.डी. प्लेयर चाहिए...”
“क्या
फर्क पड़ता है बेटे...”
“बहुत
फर्क पड़ता है पापा...! प्यूरिटी पापा प्यूरिटी... म्यूजिक में जो
प्यूरिटी चाहिए...”
“संगीत
में प्यूरिटी... मैं समझा नहीं...”
राधेलाल ने अपनी अज्ञानता प्रकट की।
“यस
पापा, कैसेट में वो प्यूरिटी यानी शुद्धता नहीं आ सकती हो सी.डी.
प्लेयर से आती है। आई मीन पापा.... आप.... आप समझ नहीं सकते...”
सच
राधेलाल की समझ से बहुत चीजें दूर होती जा रही हैं। उसे आज का फिल्मी
संगीत समझ में नहीं आता है, उसे बीट्स समझ नहीं आते हैं। उसे ’बेस’ की
समझ नहीं है। उसे समझ नहीं आता कि आज के संगीत में ऐसा क्या है जिसको
बारीकी से समझा जाए। राधेलाल को समझ में नहीं आता कि काम भावना को
भड़काने वाले इन अश्लील गानों को समझने की आवश्यकता क्या है? उसे समझ
नहीं आ रहा है कि घरेलू आवश्यकताओं से अधिक सी.डी. प्लेयर की आवश्यकता
क्या है? वह समझ नहीं पा रहा है कि सी.डी. प्लेयर कब घर की प्राथमिकता
बन गया है।
सच
राधेलाल बहुत अज्ञानी है परंतु विडंबना यह है कि वह अपने अज्ञान को
प्रकट नहीं कर सकता। राधेलाल ने सोचने की मुद्रा में गरदन झुका ली,
वस्तुतः वह शर्मिंदा था।
“पापा...
अगर आपके पास अभी पैसे नहीं हैं तो इंस्टालमेंट्स में ले लो... मैंने
पता कर लिया है सिर्फ बाईस परसेंट इंट्रेस्ट पड़ता है...”
अज्ञानी पिता को ज्ञानी पुत्र ने सरल मार्ग सुझाय। यही मार्ग
मध्यवर्गीय आवश्यकता बन गया है।
राधेलाल को अपना बेटा थानेदार लग रहा था जिसने उसका रिमांड खींच डाला
था और राधेलाल ने गुनाह न करते हुए भी अपना गुनाह मानते हुए
’हाँ’
कह दी। |
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