अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
03.30.2008
 

कौन कुटिल खल कामी - पुस्तक परिचय
डॉ. प्रेम जनमेजय


बहुत आवश्यक है सामाजिक एवं आर्थिक विसंगतियों को पहचानने तथा उनपर दिशायुक्‍त प्रहार करने की। पिछले दस वर्षों में पूँजी के बढ़ते प्रभाव, बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ’संस्कृति’ के भारतीय परिवेश में चमकदार प्रवेश ने हमारी मौलिकता का हनन किया है। दिल्ली की जिन गलियों को कभी शायर छोड़कर नहीं जाना चाहता था अब वही गलियाँ मॉल-संस्कृति की शोभा बढ़ाने के लिए दिल्ली को छोड़कर जा रही हैं। अचानक दूसरों का कबाड़ हमारी सुंदरता और हमारी सुंदरता दूसरों का कबाड़ बन रही है। सौंदर्यीकरण के नाम पर, चाहे वो भगवान् का हो या शहर का, मूल समस्याओं को दरकिनार किया जा रहा है। धन के बल पर आप किसी भी राष्ट्र को श्मशान में बदलने और अपने श्मशान को मॉल की तरह चमकाकर बेचने की ताकत रखते हैं।

नंगई मार्केटिंग का धंधा जोरों पर चल रहा है और साहित्य में भी ऐसे धंधेबाजों का समुचित विकास हो रहा है। कुटिल-खल-कामी बनने का बाज़ार गरम है। एक महत्त्वपूर्ण प्रतियोगिता चल रही है— तेरी कमीज मेरी कमीज से इतनी काली कैसे? इस क्षेत्र में जो जितना काला है उसका जीवन उतना ही उजला है। कुटिल-खल-कामी होना जीवन में सफलता की महत्त्वपूर्ण कुंजी है। इस कुंजी को प्राप्त करते ही समृद्धि के समस्त ताले खुल जाते हैं।

व्यंग्य को एक गंभीर कर्म तथा सुशिक्षित मस्तिष्क के प्रयोजन की विधा माननेवाले प्रेम जनमेजय ने हिंदी व्यंग्य को सही दिशा देने में सार्थक भूमिका निभाई है। परंपरागत विषयों से हटकर प्रेम जनमेजय ने समाज में व्याप्त आर्थिक विसंगतियों तथा सांस्कृतिक प्रदूषण को चित्रित किया है। प्रस्तुत संकलन हिंदी व्यंग्य साहित्य में बढ़ती अराजक स्थिति से लड़ने का एक कारगर हथियार सिद्ध होगा।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें