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03.30.2008
 

... कई दिनों के बाद
डॉ. प्रेम जनमेजय


सृजन का अपना सुख है और अपनी कृति को अद्वितीय समझने का मोह मानवीय प्रकृति है। लेखक द्वारा लिखी गई अधिकांश रचनाएँ अपने शैशव में अनुपम, धांसू, बेजोड़, सर्वोत्तम आदि आदि ही होती हैं। (आदि, आदि में और कितने अनादि शब्द छिपे हैं, इसे जानने के लिए आप चाहें तो अरविंद कुमार एवं कुसुम कुमार द्वारा संपादित समांतर कोष का आश्रय ले सकते हैं।) ये दीगर बात है कि ’असाम्प्रदायिक’ आलोचकों का निर्मम प्रहार इस मोह के टुकड़े-टुकड़े कर डालता है और रचना की साहित्याकाश में उड़ती हुई धज्जियाँ अनेक ’अपनों’ को सुख देती हैं। अपने शैशव में हर पूत सपूत ही होता है, अतः लाडला होता है और इस पूत के पाँव पालने में देखने का कोई कितना ही दावा कर ले उसका असली चेहरा जवानी में ही स्पष्ट होता है। ऐसे में अनेक बार अपने सृजन पर पछतावा भी होता है और भलामानुस शर्मिंदा होकर सोचता है कि मैंने कैसी संतान को जन्म दे डाला।

इस संकलन को आपके समक्ष करते हुए मैं अत्यधिक शर्मिंदगी का अनुभव कर रहा हूँ। जानता हूँ कि आज के उपभोक्तावादी समाज में शर्मिंदा होना कोई अच्छी बात नहीं है और यह अत्यधिक ही पिछड़ा हुआ भाव है। आजकल तो ’बेशर्ममेव जयते’ का भाव ही अच्छे भाव दिला जाता है।

मैं यह सोचकर शर्मिंदा नहीं हूँ कि मैंने कैसी संतान को जन्म दे डाला और न ही इस कारण कि मेरे पिछले संकलन का शीर्षक था – शर्म मुझको मगर क्यों आती? (यह 1998 में प्रकाशित हुआ था, और आज 2008 है।) मैं शर्मिंदा हूँ और मेरी इस शर्मिंदगी को वो ही समझ सकत है जिसने नागार्जुन कि कविता ’अकाल’ को ध्यान से पढ़ा है, अपने जीवन में उसकी प्रतिछाया देखी है तथा उसके अनेक रूप देखे हैं। इसे वो ही समझ सकता है जिसनए अकाल की विभिषिका को भोगा है।

इस अकाल के हमारे जीवन में अनेक रूप हैं – हरि अनंत, हरि कथा अनंता जैसे रूप।

अकाल का एक रूप मैंने देश में आपात्‌काल लगने पर देखा था। उन दिनों मैंने बाबा नागार्जुन की इस कविता का आश्रय ले एक पैरोडी भी लिखी, जो धर्मयुग में प्रकाशित हुई थी तथा जिसे मैंने बाबा को अपने नारोजी नगर वाले आवास में सुनाया भी था और उनकी अनगढ़ दाढ़ी में सुसज्जित निश्छल मुस्कान का आनंद उठाया था। मैंने लिखा था —

बहुत दिनों तक जनता रोई

संसद रही उदास

बहुत दिनों तक पत्नी सोई

डरे पति के पास।

बहुत दिनों तक लगी देश में

जासूसों की गश्त

बहुत दिनों तक लेखकों की भी

हालत रही शिकस्त।

 

अकाल केवल दानों के अभाव का नाम नहीं है। अकाल लेखक के जीवन में भी आता है – जब उसकी प्राथमिकताएँ रोती रहती हैं, जब कई दिनों तक सृजन-स्रोत अलग राह पकड़े उदास होते हैं और जब विचारों के चूहों की हालत शिकस्त रहती है। यह अकाल प्रत्येक कलाकार के जीवन में आता है। मैं लिक्खाड़ और प्रोफेशनल रचनाकारों की बात नहीं कर रहा हूँ जो कमर कसे रचनाओं का उत्पादन करते हैं।

ऐसे ही एक अकाल का आरंभ मेरे लेखकीय जीवन में 14 जनवरी, 1999 से आरंभ हुआ जब मैं ’वेस्ट इंडीज़ विश्वविद्यालय’ में अतिथि आचार्य के रूप में त्रिनिदाद एवं टुबैगो के लिए, हिन्दी को अंग्रेज़ी के माध्यम से पढ़ाने के लिए रवाना हुआ था। वहाँ जाने के अनेक व्यक्तिगत लाभ हुए। पहली बार हिन्दी ने डॉलर दिलवाए और अपनी आर्थिक दशा सुधरने लगी। पहली बार विदेश यात्रा की और विदेश यात्रा के भूत को सिर से उतारा। पहली बार जाना कि ’डिप्लोमैटिक लाईफ़’ क्या होती है और विदेश – सेवा में लिप्त ’श्रेष्ठियों’ के सामने मास्टरों की औकात क्या होती है। पहली बार जान कि अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में आलेख पढ़ने का क्या ’सुख’ होता है। पहली बार अनुभव हुआ कि हज़ारों मीर दूर भी एक लघु भारत है जहाँ हिन्दी पढ़ाने वाले का सम्मान होता है, वह वी.आई.पी. भी हो सकता है। ऐसे अनेक लाभों ने ऐसा अभाव उत्पन्न किया कि लेखकीय जीवन में अकाल की स्थिति आ गई। कुछ दूर से आकर्षक दिखने और ललचाने वाली ’वस्तुओं’ के करीब हुआ तो साहित्य से दूर हुआ। अतिथि आचार्य के अपने धर्म और विदेशों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार की अपनी भूमिका से बँधा मैं अपनी प्राथमिकताओं से मुँह चुराने लगा जिससे एक अकाल मेरे साहित्यिक जीवन में पैर पसारने लगा।

लगभग चार वर्ष तक इस अकाल को मैंने भोगा।

चार वर्ष बाद लौटा तो एक अजीब-से नशे के साथ। आते ही ज्ञान चतुर्वेदी के सुझाव पर रवीन्द्र कालिया की ’गालिब छुटी शराब’ पढ़ी। जाना कि नशा चाहे शराब का हो या विदेश-प्रवास का, उसे छोड़ने के लिए अपने से बहुत संघर्ष करना पड़ता है। जाना कि कैसे जहाज का पंछी फिर-फिरी जहाज पर आता है और मन को अनंत सुख नहीं मिलता है। ऐसा नहीं कि इस बीच कुछ नहीं लिखा, पर जो लखा उतने से मन संतुष्ट नहीं। मस्तिष्क-भीति पर छिपकलियों की गश्त लगी रही।

हरिशंकर परसाई की एक व्यंग्य रचना मुझे बहुत ही पसंद है, ’अकाल उत्सव’। इस रचना में परसाई ने मानवीय जिजीविषा का अत्यधिक ही सार्थक चित्रण किया है। अकाल में फँसे लोगों की जिजीविषा को रेखांकित करते हुए वे लिखते हैं – हड्डी – ही – हड्डी। पता नहीं किस गोंद से इन हड्डियों को जोड़कर आदमी के पुतले बनाकर खड़े कर दिए गए हैं। यह जीवित रहने की इच्छा ही गोंद है। यह हड्डी जोड़ देती है। सिर मील भर दूर पड़ा हो तो जुड़ जाता है। जीने की इच्छा की गोंद बड़ी ताकतवर होती है। पर सोचता हूँ यह जीवित क्यों हैं? ये मरने की इच्छा खाकर जीवित हैं। मरने की इच्छा खाकर जीवित रहने की प्रक्रिया ही तो संघर्ष का आकार है। इसी इच्छा के कारण मैं अपना नाटक, ’सीता अपहरण केस’ पूरा कर पाया और इसी इच्छा के कारण ’व्यंग्य यात्रा’ आरंभ कर पाया।

इस नश्वर संसार में कुछ भी अनश्वर नहीं तो अकाल कैसे हो सकता है। दानों को घर में आना था, चाहे कुछ ही दानों को, वे आये। ये दानें संकलन के रूप में आपके सामने प्रस्तुत हैं। सुदामा के ये दानें कैसे हैं निसंकोच बताईएगा।

आप सहमत हों या न हों मैं तो बाबा नागार्जुन के स्वर में स्वर मिलाकर कहूँगा – कौवे ने भी पांखें खुजलाई, की दिनों के बाद।


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