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| 10.22.2007 |
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होली खेलते कोतवाल डॉ. प्रेम जनमेजय |
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राधेलाल जी नए-नए थानाध्यक्ष बने थे। अत: उनमें एक सच्चे पुलिस वाले के
गुणों का विकास नहीं हुआ था। आम आदमी की तरह उनके हृदय में भले-भले
विचार भारतीय अर्थव्यवस्था की तरह उठते-गिरते रहते थे,
जो
उनके पुलिस जीवन के लिये खतरनाक ही नहीं,
आत्मघाती भी थे। अपनी और सहयोगियों की आर्थिक दशा सुधारने की बजाय वह
स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ाए जाने वाले
’पुलिस
जी’
की
साफ-सुथरी तस्वीर कैसे बने,
इसी
का चिंतन किया करते थे। इस मूढ़ पुलिस अधिकारी को यह न पता था कि एक
सच्चे पुलिस वाले के शरीर में आत्मा का निवास नहीं होता है,
अत:
आत्म-चिंतन से उसे दूर ही रहना चाहिए। चिंतन के खतरनाक क्षणों में
राधेलाल ने सोचा कि इस बार थाने में होली का उत्सव मनाया जाए।
थाने
में होली मनाना ऐसा ही था जैसे शिव के हृदय में कामदेव को जगाना अथवा
किसी देश सेवक के हृदय में देश सेवा के भाव को तलाशना,
परंतु
ऑर्डर इज ऑर्डर।
लोकल
लीडर छुटभैया जी को इसका पता चला तो हार पहनने को उत्सुक गला शुष्क
होने लगा और उद्घाटन करने को उत्सुक हाथ मचलने लगे। थाने में पहली बार
होली उत्सव हो और उसका उद्घाटन छुटभैया जी न करें,
ऐसा
कैसे हो सकता था। वैसे भी यह जनता में लोकप्रिय होने का सुअवसर था।
उन्होंने कुछ नहीं किया तो थानेदार जनता में लोकप्रिय हो जाएगा। अगर
थानेदार लोकप्रिय हो गया तो हो सकता है कि त्यागपत्र देकर अगले चुनाव
में ही कूद पड़े। प्रजातंत्र में चुनाव जीतने के लिए लोकप्रिय होना
सबसे महत्वपूर्ण योग्यता है। आधुनिक इंद्र का सिंहासन डोलने लगा।
उन्होंने अपने चमचों को थाने में भेजकर होली उत्सव उद्घाटन की योजना
बना डाली। होली के अवसर पर बोलने के लिए एक मंचमोचक कवि से हास्यास्पद
रस की कविता भी लिखवा ली।
होली
वाले दिन थाना,
थाना
नहीं,
अपितु
नंदन-कानन लग रहा था या किसी मंत्री-पुत्री के विवाह का दृश्य लग रहा
था अथवा किसी माफिया गिरोह द्वारा लंबा हाथ मारो उत्सव लग रहा था। थाने
में भली-भांति के फूल खिले हुए थे--- हफ़्ता देने वाले व्यापारी संघ
के प्रतिनिधि,
जेबकतरा,
वेश्या-समाज की अध्यक्षा,
गुंडा
स्वयंसेवक समुदाय के प्रतिनिधि आदि सब अपनी यथाशक्ति उत्सव को शानदार
बनाने की प्रक्रिया में समारोह की शोभा बढ़ा रहे थे। भीड़ थोड़ी कम थी,
इसलिए
नेता जी के विशेष अनुरोध पर लॉकअप में बंद सज्जनों को छोड़ दिया गया
था। वैसे भी होली तो त्योहार ही है,
आपसी
भेदभाव को मिटा देने का। अच्छा नहीं लगता है कि होली के दिन एक ही
बिरादरी के कुछ लोग सीखचों के बाहर हों और कुछ अंदर हों। भाषण देने का
उचित माहौल देखकर छुटभैया जी आरंभ हुए -- "प्यारे भाइयों,
मुझे
अफसोस है कि हमारी बहनें यहाँ मौजूद नहीं हैं। इस क्षेत्र में फूलन
देवी जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर हमारी बहनों ने कोई खास प्रगति भी
नहीं की है। पुरुष से कंधा मिलाकर चलने की दिशा में यहाँ कुछ कमी रह गई
है। मैं सरकार को मजबूर करूँगा कि वह कुछ ठोस कदम उठाए,
कुछ
आरक्षण प्रबंध करे। मुझे विश्वास है कि अगली होली में बहने अधिक से
अधिक संख्या में भाग लेंगी। मैं नारी निकेतन की अध्यक्षा से व्यक्तिगत
रूप से हाथ जोड़कर विनती करूँगा कि वह कुछ बहनों को यहाँ भेजें और यहाँ
की शोभा बढ़ाएँ।" (तालियाँ)
"होली,
जैसा
कि आप जानते हैं बड़ा पवित्र त्योहार है। हम सबने दरजा तीन और चार में
होली के बारे में खूब लिखा और पढ़ा है। मुझे याद है जब मैं दरजा सात में
था,
हमें
अंग्रेजी में एक निबंध लिखने को आया था-- माई समर हॉलीडे,
तो
हमने गर्मियों में होली मनाने की आवश्यकता पर पाँच पेज का निबंध लिख
डाला था और हमारे मुंशी जी की किरपा से हम पास भी हो गए थे। इतना लगाव
रहा है हमें बचपन से होली का।
आज
खुशी की बात है कि इस देश का एक अदना-सा सेवक,
मैं,
होली
का उद्घाटन कर रहा हूँ। आज हमारो शहर के थानेदार साहब,
उनके
सभी सिपाही और यहाँ तक कि हमारे हवालाती भाई भी मौजूद हैं। आज के दिन
कोई छोटा या बड़ा नहीं होता है,कोई
भेदभाव नहीं होता है। आप सब आपसी भेदभाव भुलाकर ोली खेलें और भविष्य
में इसी तरह कदम-से-कदम बढ़ाकर अपनी और देश की प्रगति में अपना योगदान,
हमें
अपान सेवक बनाकर दें। बोलो,
भारत
माता की जय।"
इसके
पश्चात छुटभैया जी ने सोने की एक पिचकारी से खून जैसे लाल रंग को
थानेदार पर छोड़कर होली उत्सव का उद्घाटन किया। पिचकारी नेताजी ने जेब
में रख ली और रंग थानेदार पर ही रहने दिया। नेताजी ने थानेदार को भी आज
अपने रंग में रंग लिया था। इसके पश्चात् सभी एक दूसरे पर रंग डालने
लगे। अद्भुत दृश्य था। नेताजी थानेदार को,
थानेदार सिपाही को और कैदी अपने पुलिस भाइयों को अपने रंग में रंग रहे
थे। सबके चेहरे रंगों से ऐसे पुते हुए थे कि कोई पहचाना नहीं जा रहा
था। गंगा जमुना और सरस्वती की त्रिवेणी बह रही थी। सबकी आत्मा पर एक ही
रंग था,
बस
शरीर पर वस्त्र अलग-अलग थे। किसी ने खादी के वस्त्र धारण किए हुए थे,
किसी
ने खाकी वर्दी धारण की हुई थी और किसी ने कैदियों की पोशाक धारण की हुई
थी। थोड़ी देर में यह भेद भी समाप्त हो गया।
इस
बीच थाना कर्मचारियों की पत्नियाँ हाथ में गुंजिया,
भांग
के लड्डूओं और सोमरस के साथ अवतरित हुईं। प्राचीन काल में होने वाले
होली उत्सव जैसे साक्षात हो गए। देवता भी अपनी-अपनी खिड़िकियों से
झाँक-झाँक कर इस आलौकिक दृश्य का आनंद उठाने लगे। कुछ देवता तो इस
अद्भुत मिलन को देखकर फूल भी बरसाने लगे। कितने आश्चर्य की बात थी कि
जहाँ समाज की इतनी दिग्गज महान विभूतियाँ मौजूद थीं,
वहाँ
कत्ल,
चोरी,
डकैती
या बलात्कार जैसी कोई वारदात नहीं हो रही थी। किसी ने सच ही कहा कि यदि
हमाम में सब नंगे हों तो समझो कि अंधेरा दूर नहीं या फिर दिये तले
अंधेरा इसी को कहते हैं।
ग्रहों के अद्भुत मिलन के देखकर देश भर के ज्योतिषयों ने अपनी-अपनी
पोथियाँ बाँचनी शुरू कर दीं। आम आदमी होली के इस अवसर पर अपने घर की
दीवारों में कैद आतंकित-सा बिना सर्दी के कंपकंपा रहा था। मोहल्ले सूने
और शांत थे तथा कुत्ते इस सुअवसर का लाभ उठाकर भौंक रहे थे। सैंया जब
कोतवाल होते हैं,
तो
चाहे किसी बात का डर न हो,
परंतु
जब कोतवाल साहब होली खेलते हैं,
तो
समझ लो काफी कुछ हो लिया।
जैसे-जैसे होली समाप्त होने को आ रही थी,
वैसे-वैसे आम आदमी की धड़कन बढ़ रही थी। खाने-पीने और बहकने के बाद थाने
से जो काफ़िला शहर के बीच निकलना था उससे बचाव में ही सुरक्षा थी। |
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