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| 10.22.2007 |
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एक अनार के कई बीमार डॉ. प्रेम जनमेजय |
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विदेशी चैनलों के युग में जैसे भारतीय संस्कृति गायब है,
वैसे
ही पिछले कई दिनों से राधेलाल गायब है। भारतीय जनता बुद्धू बक्से की
नशेड़ी है,
मैं
राधेलाल का नशेडी हो गया हूँ। जानता हूँ कि राधेलाल से मिलकर मुझे कोई
सार्थक उपलiब्ध
नहीं होगी,
घंटों
इधर उधर की हाँक कर वह मेरा समय ही नष्ट करेगा,
पर
क्या करूँ जानकर भी अनजान होना पड़ता है। लोग जानते हैंं कि शराब आत्मा
और शरीर दोनों का नाश करती है,
लोग
जानते हैं कि जिन्हें हम जनसेवक समझकर वोट देते हैं,
वो
जनता और देश दोनों का नाश करते हैं,
परंतु
स्वयं को भुलावे में रखने की हम भारतीयों को आदत पड़ गयी है,
और
मैं भी भारतीय हूँ। लोगों के लिए मजबूरी का नाम महात्मा गांधी होता है,
मेरे
लिए राधेलाल होता है। दफ्तर से घर लौटता हूँ तो निगाहें राधेलाल को
तलाशती हैं कि उसका बटन खोलूँ और कुछ भी अनाप खनाप सुनता रहूँ। राधेलाल
अनाप शनाप बोलता है तो कुछ भी सोचने को मन नहीं करता है,
मन
करता है तो बस उसे देखने और उसकी बकवास सुनने का। जीवन में जब कुछ
सार्थक न रह गया हो तो बकवास सुने बिना गुजारा ही कहाँ है। चुनाव के
दिनों में लगातार बकवास सुनते सुनते अब कुछ भी सार्थक सुनने का मन ही
नहीं करता है।
बहुत
ढूँढने पर भी राधेलाल ईमानदारी,
नैतिकता और न्याय की तरह नहीं मिला। जैसे महापुरुष सत्य की खोज में
निकल पड़े थे,
वैसे
ही मैं भी राधेलाल की खोज में निकल पड़ा। महापुरुष तो सत्य की खोज में
जंगलों,
पहाड़ों,
नदियों,
नालों
आदि में भटके थे और मैं भी खोज के नाम पर भटकना चाहता था परंतु मेरा
भाग्य कि मेरा सत्य,
राधेलाल,
मेरे
घर से मात्र सौ गज की दूरी पर रहता है। महानगर में ये दूरियाँ ऐसे होती
हैं जैसे हाथी के मुँह में गंडेरी या राजनेता की जिंदगी में सौ रुपए का
घोटाला।
मैंने
राधेलाल को घर में खोजा तो पाया कि दोनो हाथों में सर दिए वह ऐसे
सुशोभित हो रहा है जैसे विदेशी चैनलों के बीच भारतीय दूरदर्शन सुशोभित
होता है। राधेलाल के चेहरे पर कृषि दर्शन की शुष्कता थी और आँखें किसी
समाचार वाचक सी बेजान थीं। ओंठ टेलीफिल्म की तरह नीरस लग रहे थे।
"अरे
राधेलाल,
ये
क्या महात्मा बुद्ध की तरह मुद्रा बनाए बैठा है
?"
मेरा
प्रश्न सुनकर राधेलाल ने सर उठाकर देशा और थोड़ा ब्रेक के बाद बोला,
’’महात्मा
बुद्ध की तरह मुद्रा नहीं,
मैं
महात्मा बुद्ध की तरह घर छोड़ने कह सोच रहा हूँ।"
"........घर छोड़ने की सोच रहा है! तुझे किस सत्य की तलाश है,
प्यारे राधेलाल
?"
’’सत्य
गया भाड़ में,"
राधेलाल नें सच ही कहा,
आजकल
सत्य भाड़ में ही रहता और सच कहने वाले भाड़ झोंकते है। सत्य के
पास आजकल न तो न्यायालय में रहने के लिए जगह है और न संसद में।
लोगों के दिल ईर्ष्या,
द्वेष
और आकांक्षाओं से भरे हुए हैं,
बेचारा रहे तो रहे कहाँ
?
’’यार
सत्य नें तेरा क्या बिगाड़ा है,
जो
उसे तू भाड़ में झोंक रहा है?
बहुत
परेशान लग रहा है चिंता मत कर मंहगाई जल्दी ही दूर होगी। विश्व बैंक से
बहुत सा उधार मिलने वाला है।"
’’मंहगाई
गयी भाड़ में वो तो साली हर समय लागू रहती है। जब से मैं पैदा हुआ,
और आज
जब मेरी पैदावार मेरे लिए पोते - नातियों को संसार में ला रही है,
एक
दिन भी ऐसा नहीं गया कि मैंने ंहगाई का रोना न सुना हो। इतने वेतन
आयोग आ गए,
इतने
डी. ए. - शी. ए. मिल गए पर महंगाई को नहीं जाना था नहीं गई। इधर सरकार
वेतन बढ़ाती है और उधर दूकानदारों
दाम बढ़ा देते हैं। घर कभी महंगाई के लिए अखाड़ा बनता है और कभी
दूरदर्शन के कारण।"
’’दूरदर्शन
के कारण घर अखाड़ा बना हुआ है,
मैं
समझा नहीं..."
’’तू
समझेगा भी नहीं,
जाकि
फटी न पैर बिवाई,
वो
क्या जाने पीर पराई। तेरा क्या है,
घर
में एक तू है और दूसरी भाभी जी हैं। बच्चे होस्टल में पढ़ रहें हैं।
यहाँ दो लड़कियाँ,
एक
लड़का,
बहू,
पोते
- पोतियाँ और एक अदद पत्नी,
है।"
’’ये
तो अच्छा ही है,
भरा
पूरा परिवार है,
जैसे
शांति धारावाहिक का है।"
’’शांति
नहीं अशांति कह.... समझ ले जो हाल शांति धारावाहिक का है,
वही
हाल मेरा है। बस नाम की शांति है।"
’’वो
कैसे
?"
"वो
ऐसे प्यारे प्रेम भाई,
टेलीविजन एक है और उसके प्रेम दीवाने अनेक हैं। किसी को कामेडी सीरियल
देखना है तो किसीको सस्पेंस वाला देखना है,
किसी
को फिल्म देखनी है तो किसी को धार्मिक धारावाहिक देखना है,
किसी
को क्रिकेट का मैच देखना
है तो किसी को समाचार सुनने हैं। इस चक्कर में सारे घर में महाभारत मचा
रहता है। शाम को दफतर से घर का लौटता
हूँ तो कोई चाय को नहीं पूंछता है। बच्चे किताबें कम खोलते हैं,
टी.वी. ज्यादा खोलते है।
किसी के पास किसी से बात करने के लिए समय नहीं है। घर में घुसते ही घर
घर कम मछली बाजार अधिक
लगता है। यकीन न हो तो अंदर घुसकर
देख लो...."
"ओह
तो तुम इसलिए बाहर बरामदे में बैठे हो... शुक्र है घर का कोई कोना,
चाहे
घर से बाहर ही हो,
तो
तुम्हारे आराम के लिए सुरक्षित है।"
"कैसा
आराम
?
यहाँ
भी कोई चैन से नहीं बैठने देता है... अभी देखना थोड़ी देर में..."
राधेलाल नें बात अभी पूरी ही नहीं की थी कि उसके पोते पोतियों ने लड़ते
झगड़ते प्रवेश किया। तीनो को लड़ते देश भारतीय संसद की याद हो आई। भारत
का सुनहरा भविष्य इस विषय पर संघर्ष - पथ पर कदम से कदम मिलाए चल रहा
था कि घर में किस कंपनी के नुडल्स आएँगें और किस कंपनी की सॉस आएगी और
किस कम्पनी का ठंडा पेय आएगा। इस महाभारतीय संग्राम में अंतत: तय हुआ
कि तीनों के लिए अलग अलग कंपनियों के पदार्थ आयेंगें।
मैंने
कहा "सच राधेलाल,
ये तो
बहुत बड़ी समस्या है..." |
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