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10.22.2007
 
अनभूले तुम
डॉ. प्रेम जनमेजय


सुनहरे प्रभात की मीठी शांति
सोई हुई लहरों की तरल क्रांति
अलसाई - सी चिड़िया
अपनी गुनगनाहट से
झनझना देती है
वो ही झनझनाहट
मेरी स्मृतियों से बार - बार
खेलियाँ करती है।
मैं लौट आया हूँ
तुम्हें हज़ारों मील पीछे छोड़
मैं लौट आया हूँ
अपनी मिट्टी, अपनी गंध के बीच
क्या, मैं लौट आया हूँ!
न जाने क्यों
बार - बार
तुझमें लौट जाता हूँ
जहाज के पंछी से मन को
फिर तुझी में पाता हूँ
ओ! मेरे अवचेतन के अटूट अंग
त्रिनिदाद
तुझे भूल क्यों नहीं पाता हूँ।
क्यों, बार - बार तुझी में लौट आता हूँ
मैंनें तो
कसकैदे मछली भी नहीं खाई
मैंनें तो
अपनी उम्र भी तुझमें नहीं बिताई
फिर भी
न जाने
क्यों, बार - बार तुझी में लौट आता हूँ
आदेश, सिल्विया, सरोजिनी, जैन्सी, कादिर विवेक
रविजी, रफ़ी, लक्ष्मी, चंका, डेफ़ने, जैसे अनेक
नामों वाले, अपने चेहरे
देते हैं अवचेतन में, मेरे
दस्तक बार - बार
मैं तुझ में लौट जाता हूँ
बार - बार।
क्यों लौट जाता हूँ?
नहीं भूला है मुझे
सेंट अगस्टीन
विश्वविद्यालय के परिसर के बीच
अनेक अजनबियों की भीड़ में अकेले
अपनों को तलाशने का सुख
नहीं भूला है मुझे
पिआरको एयरपोर्ट पर
तुझसे विदा लेते
हिलते - हिलते थक गए हाथों का दुख।
जब भी
मैं
समुद्र किनारे डूबते सूरज के संग
किसी के प्यार का गीत दोहराता हूँ
क्यों, बार - बार तुझी में लौट आता हूँ



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