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10.22.2007
 
नई सहस्त्राब्दी में रजतजयन्ती की कहानियों की यात्रा से गुजरते हुए
डॉ. प्रेम जनमेजय

 

त्रिनिडाड एवं टुबैगो में संगीतज्ञ, भाषा-अध्यापक, नृत्य विशेषज्ञ एवं महाकवि की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए विख्यात हरिशंकर आदेश से मेरा पहला परिचय भारत में एक साहित्यकार के रूप में ही हुआ था। एक ऐसा कवि जो भारत के साहित्यिक जगत में, जहाँ रचनाकार अलग-अलग सम्प्रदायों में बँटे हुए हैं, किसी खूँटे से नहीं बंधा हुआ है। अत: अधिक परिचित चेहरा नहीं है। गगनांचल के सम्पादन कर्म के समय तथा भारत से बाहर निकलकर मैंने जाना कि विदेशों में ऐसे अनेक रचनाकर हैं जो अपनी सीमाओं के बावजूद रचनाकर्म में सक्रिय हैं, और इनकी हिन्दी साहित्य के प्रचार प्रसार में एक महत्वपूर्ण भूमिका है। अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए, विदेशी भाषा के अनेक दबावों के बावजूद, इन्होंने अपनी भाषा से मुँह नहीं मोड़ा है। ये रचनाकार एक मिशनरी के रूप में भी कार्य कर रहे हैं। अपनी उर्जा के बँटने के खतरे की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए इन्होंने अविस्मरणीय समाज सेवा में स्वयं को झोंक दिया है। त्रिनिडाड में आकर मैंने आदेश के रचनाकार रूप के अतिरिक्त इस पक्ष को भी देखा है। अपनी इस निस्वार्थ सेवा (पूर्णत: निस्वार्थपूर्ण नहीं क्योंकि बिना स्वार्थ के कर्म के लिए प्रेरित होने में असत्यता की गंध आती है) के कारण आदेश अपने शिष्यों द्वारा लगभग पूजे जाते हैं। त्रिनिडाड में रचनाकार आदेश से मिलना मेरे लिए एक अलग अनुभव है जिसे मैं अपने लिए संजो कर रखना चाहता हूँ और उसका रचनात्मक उपयोग फिर कभी करना चाहता हूँ। इस समय इतना अवश्य स्वीकार करना चाहता हूँ कि हरिशंकर आदेश, रविजी, राजिन, चंकासीताराम, सुमीता ब्रूस आदि के कारण त्रिनिडाड मुझे अपिरिचित नहीं लगा। रचनाकार आदेश से जब भी मिलता हूँ मेरी साहित्यिक और बौद्धिक भूख को एक तृप्ति मिलती है। जब आदेश ने अपने महाकाव्य शकुन्तला और अपने नये कहानी संग्रह रजतजयन्ती की प्रति दी तो इन्हें पढ़कर एक ऐसी ही तृप्ति मिली।

अनेक बार रचनाकार को व्यक्तिगत रूप से जानना आपको सीमा में बाँधता है परन्तु उसकी रचनाओं को एक नए कोण से देखने की दृष्टि भी देता है। आप उसके अतीत और वर्तमान को जानते हैं और उसकी रचनाओं में उसे ढूँढ ही लेते हैं। वैसे भी रचना रचनाकार के व्यक्तिगत अनुभवों की निर्वैयक्तिक अभिव्यक्ति ही तो है। मैं दावा नहीं कर सकता कि मैं आदेश के व्यक्ति से पूर्णत: परिचित हूँ, ऐसा दावा कोई भी नहीं कर सकता है, पर जितना परिचित हूँ उस आधार पर रचनाकार को उसकी रचना में न चाहते हुए भी देखा।

"रजतजयन्ती की इन कहानियों  की रचना भूमि अधिकांशत: त्रिनिडाड या भारत की है जो रचनाकार की कर्मभूमि भी रही है। कहानीकार ने केवल इसके भूगोल का ही वर्णन नहीं किया है अपितु वहाँ जिये क्षणों और वहाँ की मानसिकता का विश्लेषणात्मक चिंतन प्रस्तुत किया है। 42 प्रतिशत भारतीय मूल के त्रिनिडाड में लघु भारत बसता है, पर यहाँ के जीवन मूल्य बहुत कुछ भारतीय संस्कृति से प्रभावित हैं। इन कहानियों में आदेश के व्यापक जीवन के दर्शन होते हैं। लेखक जीवन में घटित घटनाओं को परखने की सूक्ष्म दृष्टि रखता है तथा उनपर चिंतनशील टिप्पणियाँ भी करता है। पात्रों की जीवंतता हमें अनेक बार सोचने को विवश कर देती है कि कहीं ये पात्र लेखक के व्यक्तिगत जीवन का हिस्सा तो नहीं। अलग-अलग शीर्षकों में बँटी यह कहानियाँ एक सूत्र में बँधी हुईं हैं और जीवन-उपन्यास की व्याख्या करती हैं।  इन कहानियों की जीवंतता वर्तमान से काटकर अपने रचना संसार में बाँध लेती है। जीवन मूल्यों के निरंतर पराभव से चिंतित रचनाकार अपनी चिंता को अपने पाठकों का हिस्सा बनाने में पूर्णत: सफल हुआ है।

कहानीकार आदेश जीवन मे सकारात्मक पक्ष के पक्षधर हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ उनके चिंतन के अनुरूप चलती हैं और एक सोचे सुचाए नाटकीय सकारात्मक निष्कर्ष पर समाप्त होती हैं। यह मेरी शिकायत हो सकती है पर रचनाकार के परिवेश की माँग हो सकती है।संग्रह की पहली कहानी लहू की पहाड़ियाँ पढ़कर मुझे ऐसा ही लगा। नाटकीय अंत के कारण इस कहानी का ट्रीटमेंट फिल्मी अंदाज़ का सा है। यह भारतीय फिल्म में ही सम्भव है कि आपकी पत्नी आपके साथ युद्ध के मोर्चे पर है, और उसके हाव भाव, भाषा, बोलने के तरीके आदि के बावजूद उसे पहचान नहीं पाते हैं। एसके अनेक लेखनीय तर्क हो सकते हैं, पर आलोचकीय दृष्टि को नकार नहीं सकते हैं। इस सबके बावजूद लेखक ने पति पत्नी सम्बन्धों तथा समाज में नारी की महत्वपूर्ण भूमिका को भली प्रकार चित्रित किया है। अणु एक तर्कशील नारी है जो आधुनिक होने के बावजूद इस जीवन मूल्य में विश्वास करती है संकट के समय उसे अपने पति का साथ देना चाहिए, चाहे उसके लिए युद्ध जैसा वर्जित क्षेत्र ही क्यों न हो। इस संदर्भ में अणु के तर्क अकाट्‍य हैं और अंतत: वह अपने कर्म से अपने पति से अपनी बात मनवा लेती है। त्रिनिडाड में आदर्श मूल्य स्थापित करने की प्रच्छन्न आकांक्षा ने सम्भवत: आदेश को नाटकीय अंत देने को विवश किया है।

आदेश की स्थिति चित्रण की वर्णन की क्षमता से भी मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ। वे स्थितियों का ऐसा साक्षात चित्रण करते हैं लगता है जैसे हम इन घटनाओं के साक्षी बन रहे हैं। लहू की पहाड़ियाँ पढ़कर मुझे लगा जैसे मैं कारगिल के मोर्चे पर पहुँच गया हूँ और युद्ध मेरे सामने घटित हो रहा है। ऐसे ही कमेंटरी शैली में लिखी कहानी जीत को पढ़कर लगा। इसमें आदेश के एक और विशेषज्ञ रूप से परिचय हुआ। आदेश के पाठक, उनके परिचित, उनकी संगीतज्ञ, साहित्यकार, अध्यापक तथा समाजसेवी की भूमिका से परिचित होंगें  पर सम्भवत: नहीं जानते होंगे कि वह क्रिकेट खेल के विशेषज्ञ हैं। इसे अपनी रुचि के कारण मैंने भी विशेष लगाव से पढ़ा। क्रिकेट की बारीकियों, उसके तकनीकी पक्ष तथा खेल की प्रस्तुति को जिस कमेंटरी के साथ प्रस्तुत किया है उसे पढ़कर लगता है जैसे आप खेल को पढ़ नहीं रहे हैं उसे रेडियो पर सुन रहे हैं। एक बानगी देखिए-- "अब गेंद फिर बाबू श्याम नारायण के हाथ में आ गई। एक खिलाड़ी कम होने के कारण क्षेत्र रक्षण भली प्रकार से नहीं हो पा रहा था। इसपर बाबू श्यामनारायण् ने क्षेत्र रक्षक इस प्रकार खड़े किए थे कि जिसपर विपक्षी खिलाड़ियों को हँसी आ गई। मिडविकेट और गैलरी खाली थी। सारे खिलाड़ी फील्ड की सीमाओं पर खड़े थे। मिडविकेट औ बाऊँड्री पर उन्होंने बिहारी को लगाया था। तीन गेंदें राकेश ने टिपटिप करके खेलीं। चौथी गेंद मिड ऑन से निकलकर चार रन बना गई।...."  आपकी रुचि यदि इस खेल में है तो निश्चित ही आप मुझसे नाराज़ हो जायेंगे कि मैंने बीच में ही वर्णन क्यों रोक दिया। कहानी की इस खूबी के बावजूद मुझे इसके नाटकीय अंत से शिकायत है। आदेश के सकारात्मक दृष्टिकोण के कारण मैं इस कहानी के अंत को बीच में ही जान गया। उसकी रहस्यात्मकता आदेश ने मुझ से छीन ली। पर जैसा कि हम फिल्मों के हर अंत को जानते हैं, जानते हैं कि फिल्मी हीरो कितना भी पिटे अंत में विजयी होगा, फिर भी उत्सुकता से देखते हैं, कुछ वैसा ही आदेश की कहानियों के साथ है।

आदेश की इन कहानियों में शैली की विविधता भी दृष्टिगत होती है। जीत यदि कमेंटरी शैली में लिखी हुई है तो वंदना पत्रात्मक शैली में। इस शैली में  होने के बावजूद यह कहानी कहीं शिथिल नहीं होती है। यह कहानी नारी-पुरुष विशेषत: पति पत्नी के सम्बन्धों पर आधारित है। जीवन में एक छोटा सा संदेह कितनी बड़ी विसंगति को जन्म देता है और विसंगति का यह तूफ़ान कैसे जीवन को अव्यवस्थित कर देता है, इस कहानीकार ने बखूबी चित्रित किया है। अपने अज्ञान और दुराग्रह का शिकार उत्कर्ष अपनी पत्नी वन्दना के प्रति अविश्वास के कारण अंधेरों में भटकता रहता है और अंत में अपनी भूल के कारण पश्चाताप करता है। पत्र पश्चाताप की भाषा के साथ आरम्भ होता है तथा अनेक अनुभवों से हमारा साक्षात्कार करता हुआ अंतंत: सुखाय के अंत से समाप्त होता है।

जो व्यक्ति आदेश को जानते हैं वे रजत जयन्ती कहानी में उनको ढूँढ ही लेंगे। यह कहानी भी पति पत्नी के सम्बन्धों पर आधारित है। यहाँ पति एक प्रसिद्ध साहित्यकार है। एक साहित्यकार की पत्नी को अपने पारिवारिक जीवन में जो समझौते करने पड़ते हैं तथा पति को गाड़ी को सही पटरी पर चलाने के लिए पति को जो श्रम करना पड़ता है, उसका चित्रण आदेश ने बखूबी किया है। इस कहानी में भी रचनाकार पक्ष नारी पक्ष है। डॉक्टर हरिकृष्ण प्रख्यात साहित्यकार हैं और उनकी विवाह की रजतजयन्ती है। पत्नी ने अपने सपने संजोये हैं कि वह यह अवसर काश्मीर में मनाएगी। यह पत्नी की प्राथमिकता है, और आवश्यकता भी है पर अपने जीवन मूल्यों में बंधे साहित्यकार पति की अपनी कुछ और प्राथमिकताएँ हैं। उसी दिन कवि अनुरागी की पुण्यतिथि है और हरिकृष्ण साहित्यकार परिषद के अध्यक्ष हैं। जब हरिकृष्ण अपनी प्राथमिकता के कारण काश्मीर जाने में असमर्थता प्रकट करते हैं तो पत्नी सुधा का गुस्सा फट पड़ता  है। सुधा जब कहती है ---"दिन भर आपकी सरचढ़ी सन्तति के साथ सर खपाती हूँ, अतिथियों के नखरे उठाती हूँ। कभी इस उत्सव में, कभी उस भोज में, कभी किसी परिषद की बैठक में आपका साथ देती हूँ।... मैं भी मनुष्य हूँ। कभी तुमने मेरे हृदय को भी पढ़ने का प्रयास किया?"---- यह आक्रोश हर उस पत्नी का हो सकता है जो अपनी व्यस्तताओं में पत्नी की प्राथमिकताओं पर ध्यान नहीं देता है।

रजतजयन्ती कहानी में आदेश का मन बहुत रमा है। वह साहित्यकार के पक्ष की सफाई-सी देते चलते हैं। जब रचनाकर अनुरागी के माध्यम से कवि को परिभाषित करते हुए कहता है--

(कवि) जो विश्व जनीन सत्य का प्रकाशन करे, अखिल मानव मन की अनुभूतियों को शब्द में उतार दे। हर हृदय यही समझे कि यह मेरी अनुभूति है --- तो समझ आ जाता है कि व्यक्ति को निर्वैयक्तिक करना तथा स्व: अनुभूति को सबकी अनुभूति बनाना ही रचनाकार का लक्ष्य है तथा इसमें सफल भी हुआ है। इसी साहित्यक मूल्य के कारण ही वे निज सव: को त्रिनिडाड में सबको बाँट रहे हैं। अपनी इसी सोच के कारण कहानीकार सुधा को अंतत: विवश करता है-- "सुधा ने गृह आकर अपने पति द्वारा प्रदत्त उपहारों का बंडल खोला। सबसे उपर ही रखी थी, कवि अनुरागी की अमर कृति रजतजयन्ती। उसने चारों ओर से कक्ष बन्द कर पुस्तक हृदय से लगा ली और फफककर रो पड़ी।" यह रोना आदेश के नारी पात्रों की विवशता है।

लकीरों का खेल एक लम्बी कहानी है जो आश्वस्त करती है कि आदेश बहुत जल्दी उपन्यास लिखेंगे। इसमें कहानीकार ने भारतीय मूल के त्रिनिडाडियों की नब्ज को पकड़ा है। केवल त्रिनिडाड ही क्यों, यह कहानी भारतीय मूल के हर व्यक्ति की है। पूर्वी और पश्चिमी संस्कृतियों तथा जीवन मूल्यों के टकराव की यह कहानी किसी को भी अपनी लग सकती है। भारतीयों के गले से भी यह कहानी उतर जाएगी क्योंकि तथाकथित आधुनिकता ने वहाँ भी लोगों को चमत्कृत करना आरम्भ कर दिया है। जाह्नवी पुनीत से प्रेम करती है और जब वह कहती है --इस देश में हमारे वर्ण की कौन लड़की नहीं चाहती कि उसे भारत-जात पति प्राप्त हो डॉक्टर जी हम भी तो भारत-उपवन के ही मुस्कुराते प्रसून हैं। यह दूसरी बात है कि जग-माली ने हमें भारत से सहस्त्रों मील दूर टि्रनिडाड की इस रम्य स्थली में लगा दिया है। गुलाब हर देश, काल तथा वातावरण में गुलाब ही कहलाता है"--- तो भारतीय मूल के जहाजियों की पीड़ा और मानसिकता समझ आ जाती है। पर पश्चिमी रंग में रँगी वर्षा इस भावुकता को अवीस्कार करती है। जाह्नवी अपने मूल्यों के कारण क्षय ग्रस्त प्रेमी को स्वीकार कर सकती है पर वर्षा नहीं। पूरी कहानी इन दोनों के विवाद की कहानी है। पर अंतत: कहानीकार अपनी सोच के कारण वर्षा के  चिंतन में परिवर्तन लाता है और इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि जीवन एक लकीर है।" वह सोचने लगा-- मानव जीवन भी  एक लकीर है। जन्म, विकास, शिक्षा, नौकरी, विवाह, धनोपार्जन, विलास, शिशु उत्पादन, तत्पोषण तथा अन्त में मरण। ये सब मानव-जीवन की लकीरों के विभिन्न बिन्दु हैं जे मिलकर जीवन की लकीर की रचना करते हैं।" इसी लकीर के कारण सहस्त्रों का प्रिय चिकित्सक जरा-सी भावुकता में संसार छोड़कर चला जाता है और भावुकताविहीन परिवर्तित वर्षा अतुल के निश्चेष्ट शरीर पर गिरकर निश्चेष्ट हो जाती है। यह निश्चेष्टता वस्तुत: भावनाओं का चैतन्य है।

मुझे आदेश की भाषा से शिकायत है। छायावादी शैली की रोमानियत में रमी तत्सम्‌ प्रधान भाषा पात्रों को स्वाभाविक नहीं होने देती। हर पात्र लगभग वही भाषा बोलता दिखाई देता है, उसमें कहीं भिन्नता नहीं है।

कुल मिलाकर आदेश की कथा यात्रा में यात्रा करना मुझे अच्छा लगा। नये नये पात्रों और घटनाओं के बीच गुजरते हुए मैं अनेक बार अपने वर्तमान से कटा हूँ। ये कहानियाँ सोचने को बाध्य करती हैं तथा अपने व्यापक अनुभव-क्षेत्र के कारण काफी कुछ नया प्रदान करती हैं।



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