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05.31.2008
 

वक्त की सेहरा
प्रवीर कुमार वर्मा


जिन आँखों में सदा रौब देखा था मैंने,
उन आँखों में अब ख़ौफ़ देखता हूँ मैं ।
जिन आँखों में सदा प्यार देखा था मैंने,
उन आँखों में अब नफ़रत देखता हूँ मैं ।
जिन आँखों में सदा अपनापन देखा था मैंने,
उन आँखों में अब परायापन देखता हूँ मैं ।
आँख तो आँख न हो आईना हो गया है,
आँखों को क्या हुआ है या नज़र का धोखा है
आँख वक्त की सेहरा से रिश्ते बदलते देखता है ।


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