गिरगिट परेशान है आदमी को देखकर
क्यों है वह बदनाम भला आदमी से पेशतर ।
रूप गुण बदलने वाले फनकार भी शर्मसार,
हम तो केवल मात्र रगंमंच के कलाकार !
आदमी अपनों में हो तो अपना ही जलवा दिखाता है ,
जब अपनों से दूर हो तो अपनों को मुँह चिढ़ाता है !
आदमी का है उसूल - मानों पानी का बुलबुला,
नाहक ’गिरगिट’ की बदनामी ने दिया है मुझे रुला!