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ISSN 2292-9754

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07.28.2014


जीवन साथी

प्रिय विजया,

जाने क्यों आज तुम्हारी बहुत याद आ रही है। रह-रह कर वह दिन याद आता है जब मैं तुम से पहली बार मिला था। साँवली-सलोनी सी तुम्हारी सूरत में एक क़शिश सी थी। सच कहूँ तो तुम से पहली बार मिल कर उतना आकर्षित नहीं हुआ था, जितना तुम्हें जानने के बाद। जितनी सादगी तुम्हरे चेहरे पर थी उससे ज़्यादा तुम्हारे चरित्र में थी। उसी सादगी से बँध-सा गया था मैं।

तुम्हे याद है पहली बार जब तुमने मेरा हाथ पकड़ा था। उस दिन पूरे शहर में बिजली चली गई थी। वैसे तो ऑफ़िस में देर रात तक काम करने की आदत थी तुम को, पर बिजली जाने से उस दिन तुम कुछ डर गई। उस वक़्त तुम्हारा चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे साँझ का सूरज कुछ ज़्यादा सुर्ख हो गया हो। आँठवें माले पर था हमारा ऑफ़िस और तुम अकेली लड़की थी, पूरे ऑफ़िस में। वैसे तुम थी बहुत हिम्मत वाली, जिस ज़माने में लड़कियाँ दिन में भी घर से बाहर जाने में डरती थी उस ज़माने में तुम रात की शिफ्ट में काम करती थी।

पर उस दिन मैंने पहली बार तुम्हारे चेहरे पर घबराहट/परेशानी देखी। कुछ देर तुमने इंतज़ार किया बिजली आने का, पर जब पता चला कि बिजली आने मे 4-5 घंटे लगेंगे तो तुम्हरी बैचेनी और बढ़ गई। मैं सब कुछ देख और समझ रहा था पर कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी। लगता था कहीं तुम ग़लत न समझ लो। आखिरकार हिम्मत कर मैंने तुम से पूछ ही लिया कि "अगर तुम चाहो तो मै तुम्हे घर छोड़ सकता हूँ।" मुझे उम्मीद नहीं थी की तुम हाँ कहोगी। तुमने कहा, "लिफ्ट नहीं चल रही है आप मुझे नीचे तक छोड़ दीजिए।" तुमने अपना सामान समेटा और हम सीढ़ियों की तरफ बढ़े। अभी पहला माला ही उतरे थे कि कुछ गिरने की आवाज़ आई। मैं देख तो नही पाया अन्धेरे में, लेकिन ऐसा लगा कि तुम कुछ और सहम गई थी। तुमने आहिस्ता से मेरे कन्धे पर हाथ रखा। शायद तुम ये जानने कि कोशिश कर रही थी कि मैं तुम्हारे पास ही हूँ। मैंने धीरे से कहा तुम चाहो तो मेरा हाथ पकड़ सकती हो। शायद तुम चाहती नहीं थी, पर उस वक़्त तुम्हारे पास कोई और चारा भी नहीं था। मैं आज तक नहीं भूला तुम्हारे हाथों का पहला स्पर्श, जैसे किसी अल्लहड़ बदली ने बिखर कर धरती को छू लिया हो।

तुमने क्या मैंने भी नहीं सोचा था कि उस दिन जो हाथ पकड़ा वो जीवन भर नहीं छूटेगा। दो साल बाद हम शादी के अटूट बन्धन में बँध चुके थे। कितना सुन्दर दिन था वो पल जब तुम मेरे आँगन मे दुल्हन बन कर आई थी। मुझे लगा कि आकाश से उतरकर चाँद मेरी झोली में आ गिरा है। समझ नहीं पा रहा था मैं कि ये ख़्वाब है या हक़ीक़त। एक कुशल पत्नी और माँ की हर ज़िम्मेदारी को ब्ख़ूबी निभाया तुमने। शायद ही कोई अवसर याद है मुझे, जब तुमने शिक़ायत का कोई मौका दिया हो। हाँ, उस दिन जब गुड़िया आठवीं कक्षा में फेल हो गई थी तब तुमने उसे बहुत मारा था। तुम बहुत समझदार थी पर जाने क्यूँ ये समझ नहीं पाई कि हर बच्चा एक-सा नहीं होता। मुझे बहुत बुरा लगा था तुम्हारा व्यवहार। ऐसे गुड़िया बहुत होशियार थी बस पढ़ाई में कुछ कच्ची थी। तुम्हे याद है, सिलने-बुनने में वो तुम से ज़्यादा अच्छी थी। पहली बार उस दिन मुझे तुम्हे समझाना पड़ा वरना घर में ये काम तुम्हारा था। मेरी बात तुम्हें समझ में आ गई। उसके बाद तुमने गुड़िया को कभी नहीं मारा। याद है उसे फैशन ड़िज़ाईनिंग करवाने का खयाल भी तुम्हरा ही था। वो इतिहास और विज्ञान में मुश्किल से पास होती थी लेकिन बाद में फैशन ड़िज़ाईनिंग में उसने कालेज़ टॉप किया था। सच ही है बच्चों को सही राह दिखाने का काम माँ से बेहतर कोई नहीं कर सकता।

एक बार राहुल जब चरस वाले स्कैंडल में पकड़ा गया था, मैं तो डर ही गया था, जवान बेटा जेल में। उससे ज़्यादा डर था ज़माने/मुहल्ले वालों का था। जितने मुँह उतनी बातें। जाने तुम से ये चूक कैसे हुई, इतनी बडी बात हो गई और तुम्हे पता भी नहीं चला। जैसे-तैसे उसकी ज़मानत करवाई मैंने। ज़िन्दगी में कभी इतनी ज़िल्लत नहीं सहन करनी पड़ी मुझे जितनी उस दिन पुलिस चौकी में करनी पड़ी। पर तुमने सम्भाला मुझे और राहुल को भी। जानता हूँ तुमने चार घंटे राहुल से बन्द कमरे में कुछ बात की, नहीं जानता कि क्या पर उसका असर देखा मैंने। उसके बाद से राहुल की संगत ही बदल गई। मैंने उसके बाद उसे अपने पुराने दोस्तो के साथ कभी नहीं देखा। उस दिन मुझे ऐसा लगा कि तुमने वो काम किया जो शायद मुझे करना चाहिए था। एक अच्छी पत्नी की तरह मेरी हर कमज़ोरी को पूरा किया तुमने।

बच्चे बड़े हो गए, राहुल अमेरिका चला गया। गुड़िया की शादी हो गई। एक बार फिर शादी के नए दिनों जैसे हम दोनों अकेले घर में रह गए। पर इस बार इस बूढ़े में जीने का उत्साह खतम हो चुका था। तुम जानती थीं ये बात। बहुत जतन करे तुमने, मुझे में फिर से ज़िन्दादिली लाने के लिए। पर मैं थक गया था, पता नहीं तुम में इतनी ऊर्जा कहाँ से थी! तुमने आज भी पूरा घर उस ही हुनर से सम्भाल रखा था। दोनों बच्चे कहने को तुम से दूर थे पर उनके पल-पल की ख़बर होती थी तुम्हें। और मेरे... मेरे तन से मन तक की हर बात तुम भाँप जाती थी। कभी कहना नहीं पड़ा मुझे कि आज मेरे सिर में दर्द है या मन उदास है, जाने तुम्हे कैसे पता चल जाता था! शायद प्रेम शब्दों का मोहताज़ नहीं होता।

पर एक दिन जब मैं बाज़ार गया था, सब्ज़ी लेने। रास्ते में एक पुराना ऑफ़िस का दोस्त मिल गया था सो देर हो गई। मेरी ग़लती थी, मैंने फ़ोन नहीं किया कि मुझे घर आने में देर हो जाएगी। वापस आया तो तुम नहीं थी, घर पर। कुछ देर इंतज़ार किया कि शायद तुम कहीं पड़ोस में गई होगी। एक घंटा हो गया शादी के पच्चीस साल में कभी ऐसा नहीं हुआ कि तुम मुझे बिना बताए इतनी देर तक घर से बाहर रहीं। इससे ज़्यादा सब्र नहीं था मुझ में, सो मैंने पड़ोस वाली उर्मी जीजी के यहाँ पूछा, उसने बताया कि तुम जल्दी-जल्दी में कहीं निकल गई। यहीं कहा कि मैं बहुत देर से घर नहीं आया, सो मुझे ढूँढने जा रही हो। कहाँ, यह नहीं बताया। मैं भी समझ नहीं पाया कि तुम कहाँ गई होगी, और गई भी तो अब तक आई क्यूँ नहीं? सोचा कि तुम्हारी सभी सहेलियो को फ़ोन करूँ। उतने में दरवाज़े पर एक आवाज़ आई। मैं ख़ुश था, तुम लौट आई। दिल की घबराहट थोड़ी कम हुई। दरवाज़ा खोला तो तुम थीं... साथ में थी पुलिस भी और एम्बुलेंस भी। पुलिस ने बताया कि तुम हड़बड़ी में जा रही थी, सड़क पार करते हुए तुमने सामने से आते हुए ट्रक को नहीं देखा। ट्रक को पुलिस पकड़ नहीं पाई। आज तुम मेरे सामने थी, पर साथ नहीं थी। मेरे देर से आने की ग़लती की इतनी बडी सज़ा दोगी तुम, मुझे नहीं पता था। मैंने उस दिन जाने कितनी बार माफ़ी माँगी तुम से, पर तुमने मुझे माफ़ नहीं किया। आज तक नहीं किया। और मैं.. मैं समझ नहीं पाया... पूरे जीवन साथ निभा कर... एक दिन अचानक... तुम मुझे... कैसे छोड़ कर जा सकती हो... आज तक नहीं समझ पाया!!!

तुम्हारा,
अतुल


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