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10.21.2007
 
तिलस्मी ताबीज़
प्रतिमा भारती

तुम अक्सर खोलते हो
अपनी मुस्कान का तिलस्मी ताबीज़
और
बुझाते हो
रंग बिरंगी पहेलियाँ...।।

अपनी जादुई उंगली
उठाते हो आसमान की ओर
और
बादलों में खिल जाते हैं
रुपहले फूल ।।

तुम नज़रें उठाते हो
सितारों की ओर
तो वे बन जाते हैं
मचलती तितलियाँ
और गुनगुनाते हैं
मनमोहक गीत...।।

यूँ ही तुम
कभी
झरनों से कवायद कराते हो...
ओस की बूँदों से
लोरी सुनवाते हो...
किरणों को बना देते हो
ठंडी फुहार
और
हिरणों से बाँग दिलवाते हो......

अपलक देखती हूँ
सारी तिलस्म को...
और अस्थिरता
अपनी निस्पंद निस्तब्ध दुनिया की।।


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