आओ बैठें कुछ अधलेटे कुछ उन्नीदे से दिल की हरी नर्म ज़मीन पर.... सहलाएँ...नोचें...बिखराएँ ...फैलाएँ और उड़ाएँ भावनाओं और संवेदनाओं की दूब... बातें करें कुछ बिखरी बिखरी फैली बेतरतीब सी... वैसी ही जैसी होती हैं बातें.... दिल से दिल के करीब की.....