क्या सागर ने चाहा कभी वह पर्वत की चोटी पर जाए अंजुली भर भर बर्फ उठाए हिम मानव बनाए...
पर्वत ने क्या सोचा नहीं...... सागर की चंचल लहरों संग खेले इतराए ......
सूरज की इच्छा न हुई वह भी चाँदनी का लुत्फ उठाए
चाँद का जी न मचला... जाड़े की कुनकुनी धूप में हरे खेत की मेढ़ पर बैठे मीठे मीठे गन्ने खाए...