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10.21.2007
 
चाहत
प्रतिमा भारती

क्या सागर ने चाहा कभी
वह पर्वत की चोटी पर जाए
अंजुली भर भर बर्फ उठाए
हिम मानव बनाए...

पर्वत ने क्या सोचा नहीं......
सागर की चंचल लहरों संग
खेले इतराए ......

सूरज की इच्छा न हुई
वह भी चाँदनी का लुत्फ उठाए

चाँद का जी न मचला...
जाड़े की कुनकुनी धूप में
                हरे खेत की मेढ़ पर बैठे
                               मीठे मीठे गन्ने खाए...


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