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ISSN 2292-9754

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03.14.2016


बन-सिमिया

सब्जीवाला नीचे आवाज़ लगा रहा था, “आलू ले लो, मटर ले लो, गाजर ले लो, ले लो धनयाँ, हरी मिरच मूली सेम, ....।”

“अरे, सब्ज़ी ले लो, नहीं तो ठेले वाला निकल जायेगा।” मैंने पुकार लगाई, “पहले उसे रोक लो।”
प्रणति पहले ही नीचे उतर चुकी थी। आवाज़ आई, अरे वनसिमिया भी है।

प्रणति बहू का नाम।

बनसिमिया! एकदम नया शब्द! मेरे कान खड़े हो गये, मन उत्फुल्ल उत्सुकता से भर उठा।

मैं बराम्दे में निकल आई। चकित सी ऊपर से देखती खड़ी रही।

ऊपर आने पर मैंने पूछा
“कौन सी सब्ज़ी, बनसिमिया? कहाँ है? देखूँ।”
उसी बीच मेरा बेटा बोल उठा, “काहे की सब्ज़ी?”
वह उसके उधरवाले शब्दों पर हँसता है।
“हाँ, हाँ, ग्वार की फली! उसे याद आ गया होगा यहाँ यह शब्द नहीं चलता।“
कई ठेठ पुरबिया शब्द मैंने उसके मुँह से सुने हैं -वह कहती है -घी टिघल गया है।

प्रशान्त “घी टिघला” दुहराता है, “मम्मी, प्रणति का घी पिघलता नहीं टिघलता है” उसी ने मुझे बताया था।

 इस पर मुझे भी हँसी आती है मैं मुँह दूसरी और घुमा लेती हूँ।

 वह इलाहाबाद की है। चाबी को चाभी कहती है।

और मैं? मैंने बहुत प्रान्तों की खाक छानी है। शादी के पहले मध्य प्रदेश के मालवा, जिसके लिये “देस मालवा गहन गँभीर डग डग रोट पग-पग नीर” प्रचलित था, विशेष रूप से उज्जैन और शाजपुर में रही। विवाह के बाद हिमालय की तराई में रुद्रपुर पहुँची। बारह बरस पश्चिमी उ.प्र, मुजफ़्फ़रनगर रही। फिर कानपुर एक लंबा समय और अब भारत-अमेरिका के बीच शटल बनी हूँ। बीच-बीच में बड़ौदा, मथुरा, दिल्ली, बीकानेर, हरियाणा, बेगूसराय भी छूटे नहीं और घूमा कश्मीर और कन्याकुमारी तक। वि.वि कक्षाओं को भाषा पढ़ाते समय संविधान की अष्टम अनुसूची की भाषायें, उनके स्वरूप और अंतर्संबंध स्पष्ट करती रही। करेला और नीम चढा!

शुद्ध लिखने-बोलने का खब्त मुझे शुरू से रहा है। जिन दिनों लिखना सीख रही थी पिताजी के स्कूल का एक नौकर छुट्टी पर जाने पर उसके एवज में दूसरा बुला लिया गया। घर पर फाइल लेने आया तो माताजी ने पूछा, “यह काम तो जगेसर करता था, तुम कैसे?”

वह बोला, “हाँ माताजी, जगेसर की एवजी पर हम आये। हमरा नाम हुकुम सिंग है।“

मैंने अपनी कापी पर लिखा था “जगेसर की एफ़.जी. पर हुकुम सिंह काम पर आया”।

मैंने इसके पहले बताया भी था कि एफ़. जी.वाली बात लिख रही हूँ किसी ने कुछ नहीं कहा, मैंने बाकायदा अंग्रेजी के एफ़ और जी. लिखे। बड़े भाई ने अंग्रेजी छौंक की हँसी उड़ाई थी, मुझे याद है।

भाषा के बारे में ठेठ बचपन से झक्क-सी रही। जब गोआ तक नहीं पहुँची थी, गोया को असली मानती थी और जब गोवा अशुद्ध। मैंने लिखा गोया में पुर्तगाल से लोग आए थे तो मेरी खिल्ली उड़ी। पर इससे मुझे विशेष फ़र्क नहीं पड़ा था, शुद्धता अभियान चलता रहता था। वह खब्त ही क्या जो खत्म हो जाये।

सात-आठ साल की रही होऊँगी - राजस्थान के सिरोही कस्बे में थी कुछ समय। वहाँ मेरी एक सहपाठिन के पिता नाम चिमन लाल जी था। चिमन शब्द का कोई अर्थ ही नहीं होता, कम से कम मुझे तो अब भी नहीं पता।

घर पर आकर मैंने भाई से कह, “मैं चुम्बन लाल जी के घर गई थी।”

मतलब तो मुझे चुम्बन का भी पता नहीं था तब। पर यह शब्द कई गानों मे मैंने सुना था मतलब अच्छा ही होगा, सुनने में भी मधुर था।

विस्फारित नेत्र भाई बोले, ”क्या? क्या बक रही हो?”

मैंने दोहरा दिया। मैंने सोचा किसी ने बिगाड़ दिया है इनका नाम। जैसे गोवर्धन का गोरधन कर दिया भगवती का भगौती।

उन्होंने कहा, “यह नहीं होगा चिमन लाल जी होगा?।”

मैंने विश्वासपूर्वक कहा-

“नहीं! चुम्बन लाल जी है।”

भाई बेचारे चुप हो गये।

ऐसे ही एक शब्द है “नकबजन”! मुझे लगता था इसका मतलब नाक बजाना होता है। नकाब वाला अर्थ पता नहीं था। अखबार में पढती या लोगो से नकबजनी या डाका पड़नेवाली बात सुनती तो सोचती थी नाक कैसे बजाते होंगे। फिर सोचा इनका कोई रिवाज होता होगा जैसे बंगाली महिलायें मुँह से उलू ध्वनि करती हैं। वैसे ऐसी बाते मैं किसी से पूछती नहीं थी अपनी बुद्धि से मतलब भर का अर्थ निकाल लेती थी।

भूगोल पढ़ा था तो पाया था महाद्वीपों के पूर्वी भाग उपजाऊ, हरे-भरे और वर्षा वाले होते है। पश्चिम की ओर वर्षा कम, हरीतिमा भी कम और रेगिस्तानों की उपस्थिति विशेष होती है। पृथ्वी के घूर्णन की दिशा, हवाओं के संचरण तथा ऋतुओं के आवर्तन की योजना ऐसी स्थितियों का निर्माण कर देते हैं कि सागरों से उठे वर्षा के मेघ पूर्व से चल कर नमी बाँटते-बाँटते पश्चिम तक पहुँचते - पहुँचते, जल से रिक्त होते जाते हैं।

लगता है प्रकृति की यह बाँट अन्य रूपों में भी है। भाषा को ही लें- पूर्व और पश्चिम की भाषाओं में यह भेद स्पष्ट देखने को मिलता है। कहाँ पूरब की कठोर स्वरों को भी कोमल करती ध्वनियाँ और कहाँ मधुर स्वरों को भी झिंझोड़ कर खड़खड़ा देनेवाली हरियाणा जैसी बोलियाँ! विद्यापति, आदि की भाषा में बड़ी सरसता और कोमलता है उधर पश्चिम में दिल्ली हरियाणे की बोली एकदम खड़ी जैसे कोई लट्ठ लिये पीछे दौड़ा आ रहा हो! बहुत दिन रही हूँ मुज़फ़्फ़नगर में और वहाँ की बोली झेलती रही हूँ। हाँ महाराष्ट्र, गुजरात वग़ैरह भी पश्चिम में हैं पर उधर अपार सागर लहरें लेता है, हवायें सोंधे-सलोनेपन से भरी होती हैं। हवाओं की रुक्षता हरियाणा-राजस्थान तक बढ़ती जाती है। और भाषा जीवन के साथ-साथ स्वभाव बदलती चलती है।

मालवी का एक शब्द है “छो रेता” इसके जोड़ का कोई शब्द मुझे अभी तक नहीं मिला। एक विशेष प्रवाह में बोला जाता है। दूसरे लोग न वैसे बोल पाते हैं न समझ पाते हैं। “छो रेता” अर्थात् यथा स्थिति, जो है जैसा है उससे पूरी तरह संतुष्ट, किसी बदलाव की इच्छा नहीं।

पर बात तो बात बनसिमिया की थी - वन की सेम। उसे इधर ग्वार की फली और दरहरी की छियाँ भी कहते है।

प्रणति के घर में पीछे कुछ कच्ची-पक्की कुठरियाँ बनी थीं जिनमें महराजिन माली आदि रहते थे। वे लोग चल्हे जला कर लकड़ी या कंडे की आँच पर खाना बनाते थे, मिट्टी के घड़ों में पानी भरा होता था। ये वहीं पहुँच जाती थी और उनके घरों में घुस कर खा आती थी। चूल्हे के खाने का स्वाद ही निराला होता है, ऊपर से वे कभी मिस्सी रोटी, लिट्टी कभी भुने आलू, शकरकंद, मूँगफली और जाने क्या क्या! जिनमें चूल्हे की भूभल में दब कर भुनने के कारण अनोखा सोंधापन आ जाता था। वे लोग भी प्रेमपूर्वक खिलाते थे -कन्या आई है, अपने घर का पकवान छोड़ कर हमारा रूखा-सूखा खाने। वहीं इसने उनकी बोली भी सीख ली तभी तो ग्वार की फली और दरहरी की छियाँ जैसे रूखे शब्द न बोल कर बनसिमिया कह रही है।

इस के साथ मेरे मन में बनफूल, बनमाला, बनतुलसी, बनलता जैसे मीटे-मीठे शब्द झंकृत होने लगे। कैसे रूखे शब्द -ग्वार, दरहरी। लोक-भाषा के शब्दों का माधुर्य निराला होता है। कर्कश और अप्रिय शब्दों को भी कोमल और ग्राह्य बना देता है।

हिन्दी के थिसारस में एक शब्द देखा “रामजना” अर्थ दिया था “जारज, वर्ण संकर और राम जनी माने वेश्या”। लोक मानस कितना उदार और विदग्धता संपन्न है। राम के जने तो लव-कुश थे पर उनके जन्मदाता का नाम किसी को नहीं मालूम था। वे सीता के पुत्र कहलाते रहे जब तक राम ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। जिनके पिता अज्ञात रहें उन्हें जारज ही मानते हैं लोग! ऐसे सब पुत्रों को राम के नाम कर दिया। बड़ी सटीक और तीखी व्यंजना से संपन्न है लोक मन, साथ ही बड़ा विनोदी। इशारे-इशारे में मर्म पर चोट कर जाता है। बात कही किसके लिये और कहाँ पहुँच रही है। राम के कोई पुत्री नहीं थी इसीलिये “रामजनी “जारज पुत्री के लिये प्रयुक्त न कर वेश्या के नाम कर दिया (हिन्दी थिसारस)।

शादी के बाद मालवी के कुछ शब्द मेरी जिह्वा पर चढ़े थे। मैं चबूतरे को ओटला, खपरैल को कवेलू और चोकर को चापड़ कहती थी। यहाँ कामवाली को “बाई” कह दो तो गुनाह हो जाता है और वहाँ बड़ी से बड़ी महिला “बाई” लगा कर सम्मानित होती है।

क्या फ़र्क पड़ता है। पूरव में व को भ बोला जाता है। वहाँ लोग गा-गा कर बोलते हैं - ऐसा मुझे लगता है, “आइयेगाआआ..”। बिहार में यूनिभर्सिटी, भोट भैलून का चलन है। वे विमला को भिमला बना देते हैं। इन लोगों ने व को ब के स्थान पर भ बना दिया है जैसे दक्षिण की कुछ भाषाओं में सीता को सीथा बोलते हैं। ऐसे ही ग का घ और ज का झ हो जाता है। जब कि बंगाली जन भ को व और व को ब बोलते है अमिताव, सौरव और बिमल बासु आदि।

हरियाणवी की बात मत पूछिये, लगता है वीरतापूर्ण ध्वनियाँ निकाले बिना बोलने का उद्देश्य पूरा नहीं होता। जैसे कोई हड़काता हुआ पीछे दौड़ा चला आ रहा है। वे बोलेंगे -ठ्ठाले (उठा ले), बणन लग रे (बनने जा रहे है )। रुक्का देण लग री -रुक्का माने कोई लिखा हुआ काग़ज़ नहीं उलाहना या शिकायत होता है।

बंबइया बोली का एक मज़ेदार किस्सा है। अमेरिका में अलग-अलग प्रान्तों के लोग आपस में आपस मे मिलते रहते हैं मेरे पुत्र के एक बंबईवासी मित्र के माता-पिता आये थे। उन्हें हिन्दी आती है ऐसा मुझे बताया गया। कई लोग थे याद नहीं सीधे उनसे कैसे-क्या बात हुई।

चलते समय मैंने उनसे कहा, “कभी आप हमारे घर आइयेगा।”
इन्होंने मुझे कोई उत्तर नहीं दिया अपने बेटे से पूछा, ”काय म्हणते?”
उन लोगों में कुछ बात हुई और प्रशान्त के मित्र ने स्पष्ट किया।
मैंने पूछा “इन्हें तो हिन्दी आती है?”
प्रशान्त ने हँसते हुये बताया “बंबइया हिन्दी आती है। आप को कहना चाहिये था - तुम हमारे घर पे आना - तो वे समझ जातीं।“

बंबइया हिन्दी भी अलग चीज़ है!

राजस्थान में रजवाड़ों का ज़ोर रहा था कभी, उसी समय की शब्दावली है। जिसमें मिलते समय सम्मानपूर्वक कहते हैं – “घणी खम्मा” मुझे लगता है खम्मा, क्षमा का बिगड़ा रूप है। यहाँ कृपा के अर्थ में, और घनी माने बहुत अर्थात् आपकी बहुत कृपा।

मराठी में कभी महिलाओं को “अग बई” कहते सुनिये आश्चर्य और विस्मय मुद्रा पर अंकित हो जाता है।
गुजराती में किसी के घर से चलते समय कहा जाता है “आवजो“ -फिर आइयेगा।

इन शब्दों को कोई अललटप्पू नहीं बोल सकता। एक खास भंगिमा जुड़ी होती है इनके उच्चारण के साथ।
हाँ, चर्चा तो बनसिमिया की थी। याद आया, शाहजहाँपुर-बरेली के क्षेत्र में इसे वावा की फलियाँ भी कहते है। मैंने पूछा था -वावा ये कैसा नाम! उत्तर मिला -बिल्कुल सही नाम है, जो खाये वह वाह वाह करे; और जिसने न खाईं हों वह भी कहे -वाह इन्हें भी खाते है! मुलायम (राजनीति वाले नेता जी मत समझियेगा), ताजी बनसिमिया की सब्ज़ी बहुत स्वादिष्ट होती है सादी छौंक लो, मसाले की या बेसनवाली। वैसे कुछ लोग इसके कोफ़्ते भी बनाते हैं। मैंने खाये नहीं हैं पर अच्छे ही होते होंगे! पूरब की सारी बोलियाँ, मैथिली, भोजपुरी, बँगला, उड़िया असमिया लगता है जैसे कोई गाना गा रहा हो। और दिल्ली, हरियाणा, पंजाब की बोलियाँ उनसे एकदम अलग। क्या अंतर है बताना ज़रूरी नहीं समझदार के लिये इशारा काफ़ी है।


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