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ISSN 2292-9754

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04.08.2018


कविता की पहचान

भाव हृदय लय में आ जाए
मन अंदर संगीत बजाए
मिलन में गीत सुनाए
या विरह असुअन टपकाए
गम भाव चीत्कार करें जब
पंक्ति ख़ुद बन जाती है
अधरों पर आ जाती है
कविता वो कहलाती है

सात स्वरों की सुर लहरी
स्पंदन कर जाती है
तन को पुलकाती है
मन को हर्षाती है
मन के गाँठ खोलती
हर बात समझ में आती है
कभी छंद में कभी लय में
कभी अतुकांत कभी मुक्त छंद
में भी कहतीं हैं अपनी बातें
हर भाव मन के होते हैं
होती समाज की सही पहचान
सृष्टि के हर सृजन में
चराचर प्रकृति ताल तलैया
सब विषय बन जाते हैं
अंबर हो या अवनि
अपनी अपनी सब कहते हैं
कविता इसे ही कहते हैं

करनी हो कविता पहचान
आना तुम कविता के पास
इसके अंदर रम जाना
नस नस में तुम घुस जाना
तेरे अंदर की भी बात
कविता लेगी तुरंत ही भाँप

कविता सब कुछ कहती है
हास्य-व्यंग्य हो या गीत
या मन का हो कोई मीत
कविता गीत सुनाती है
अंतस में घुस जाती है
दिल की बातें मन के भाव
सब कविता में तुम पा जाओ
यही तो कविता है पहचान

तुम से मन की बात कहेगी
सहज सरल अपनी भाषा में
कभी छंद में कभी लय में
कभी इठलाती है रूबाई
कभी चौपाई कभी कुण्डली
कभी मुक्तक में करती बात
कई कई विधा बना रखी हैं
हर भाव को पकड़ें हैं
और धरा पर धर देते हैं
कहते हैं ये कविता है
कर लो अपने मन की बात।


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