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03.15.2009
 

 तुम मेरी परछाई हो
प्रताप नारायण सिंह


जीवन की सूनी राहों में, गीत मधुर तुम बिखरायी हो
मेरी अँधियारी रातों में, शशि-प्रभा बनकर छायी हो
मन मृग दर-दर भटक रहा, तुम कस्तूरी बनकर आयी हो
तपते हृदय मरुस्थल पर तुम राग सुधा सी बरसायी हो

सूनी नीदों के आँचल में स्वप्न विविध तुम बिखरायी हो
मेरी वीणा के तारों को राग नया तुम सिखलायी हो
चिर सूने उपवन में उर के, पुष्प सदृश तुम खिल आयी हो
ग्रीष्म काल चलता वर्षों से, तुम बसंत लेकर आयी हो

अभिशाप धुल रहा जीवन का, बनकर गंगा तुम आयी हो
जन्मो से बंजर धरती पर पीली सरसों सी छायी हो
दण्डित मेरे जीवन में, फल सत्कर्मो का बन आयी हो
प्यार बहुत तुमसे है मुझको, तुम मेरी ही परछाई हो


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