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01.18.2009
 

प्रतीक्षा
प्रताप नारायण सिंह


तुम्हारी प्रतीक्षा में,
रोज अपने घर को बुहारता हूँ,
सजाता हूँ पल्लव और पुष्पों से,
रास्ते में पड़े काटों को चुनता हूँ,
पिरोता हूँ बहुरंगी फूलों को माला में,
वीणा के तारों को कसता हूँ,
सजाता हूँ अपने गीतों के बोलों को,
बार बार देहरी तक देख आता हूँ,
पर तुम नही आते

सूरज चढ़ जाता है आसमान में ऊपर,
पुष्प कुम्भलाने लगते हैं,
रास्ते में सूखे पत्ते और काटें भरने लगते हैं,
वीणा के तार ढीले पड़ने लगते हैं,
पर तुम नहीं आते

सूरज छिपने लगता है दूर पहाड़ियों के पीछे,
रास्ते पर धूल का गुबार उठने लगता है,
फूल मुरझा जाते हैं,
वीणा के तार शिथिल हो जाते हैं,
मेरी आँखें डबडबा जाती हैं,
पर तुम नहीं आते

रात की स्याही से मेरा आँगन भर जाता है,
आसमान में तारे टिमटिमाते हैं,
दूर कहीं पद-चाप सुनता हूँ-
सोचता हूँ तुम राह में हो-
और फिर तैयारी करने लगता हूँ,
नए दिन के प्रतीक्षा की


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