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01.18.2009
 

पहेली
प्रताप नारायण सिंह


ह सुख है या पीड़ा
जो हर पल बरस रही है मेरे अंतर्मन में
एक अनबुझ पहेली की तरह
स्मृति की नौकाएँ लाद लाती हैं तुम्हारे आँगन से
तुम्हारी हँसी, तुम्हारे गीत, तुम्हारे कंगन
और तुम्हारी पायल
तुम्हारे चेहरे की आभा फैल जाती है
मेरे मन के आँगन में चाँदनी की तरह
तुम्हारी श्वेत छवि निरखता हूँ मैं
सम्मोहित हो, एकटक
तुम्हारे कंगन खनकते हैं
तुम्हारी पायल छनकती है
जैसे सैकड़ों सितार बज उठाते है एक साथ
तुम्हारी हँसी बिखरती है
जल तरंग की तरह
तुम्हारे गीतों के बोल मेरे होठों पर
बिखर जाते हैं मुस्कराहट बनकर
मैं गाता हूँ सातो सुरों में
नाचता हूँ उन्मत्त होकर
आनंद के अतिरेक में
मेरे हाथ उद्यत हो उठते हैं
तुम्हे छू लेने को
छन्न से टूटता है कुछ
और सब कुछ लुप्त हो जाता है
एक पल में स्वप्न की तरह
बच जाता है
धुँध, रिक्तता और छटपटाहट।


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