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03.15.2009
 

 जब तुम बरसे
प्रताप नारायण सिंह


सावन बरसे भादों बरसे
फिर भी पपिहा जल को तरसे
जनम जनम की प्यास बुझी सब
तुम स्वाती बनकर जब बरसे

चाह मिली अभिशाप सदृश
जीवन चलता संत्रास सदृश
ताप मिटा सब दग्ध हृदय का
तुम लिपटे जब चंदन बनके

नील नयन के वितान तले
अब भोर जगे अब रात ढले
अनुराग लिए मुसकान खड़ा
उतरे मधुमास जो तुम बनके

तुम आन मिले हर फूल हँसा
नयनो में मधुरिम आस बसा
खिंच गया हृदय पर इन्द्रधनुष
चहुँ ओर आज तो रंग बरसे


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