अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
02.16.2009
 

अधूरा
प्रताप नारायण सिंह


मेरे जीवन की किताब से जाने कब
प्यार का पन्ना फट कर निकल गया था
जब से होश सँभाला
उसे तलाशता रहा यहाँ वहाँ
भटकता रहा उसकी खोज में गलियों और कूचों में
ढूँढता रहा उसे विभिन्न आकृतियों में
बौराया फिरता रहा हर पल
पर वह नहीं मिला
मैं हार बैठा
समझा लिया मन को
फिर एक दिन
कुछ जानी पहचानी शक्लों वाले
शब्दों ने आवाज़ दी
पास गया तो पाया कि
ये मेरे ही गुम हुए पन्ने के शब्द हैं
मैं एक पल खुश हुआ, बहुत खुश
दूसरे पल उदास हो गया
वह पन्ना अब एक किताब बन चुका था
कैसे जोड़ पाउँगा उसे फिर
अपने जीवन की किताब से?


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें