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03.15.2009
 

अभ्युदय 
प्रताप नारायण सिंह


कल रात
मैंने खुद को जन्मते देखा
तुम्हारे शब्दों की कोख से।

युगों से अभिशप्त,
अनंत नीरव परिधि में भटकती,
अपना ठौर तलाशती
छटपटाती मुक्ति के लिए
अपनी रूह को काया में पलते देखा।

गर्भ के अँधेरे की अभ्यस्त
मेरी नन्ही आँखें, चौंधिया गयी थीं
अचानक फैले प्रकाश से ।

मेरी जननी का वात्सल्य,
मेरे नन्हे शरीर को ढक रहा था
अरुण मयूख सा
और बह रहा था,
धमनियों में रक्त के साथ।

वो बार बार मुझे सीने से चिपटाती,
मेरी मुट्ठियों को खोलकर-
मेरी नन्ही उँगलियों और हथेलियों को
अपने चेहरे से छुआती,
मेरे शरीर को अपनी आँखों में भरती,
मुझमें अपना अक्स निहारती।

उनकी आँखों से झरती खुशियाँ और सपने
मुझे अपनी बाहों में लेकर,
बार बार झुलाते,
बार बार दुलारते।

मैं, अबोध,
अपरिचित हर शब्द से
अनजान हर भाव से
अचंभित नए विस्तार से
टुकुर टुकुर देखता माँ के चेहरे को,
प्रत्युत्तर दे पाता उनकी सघन भावनाओं का
सिर्फ अपने क्रंदन से,
सिर्फ अपनी मुस्कान से।


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