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मेरे अँधेरों के वर्क़ जो
पलटे,
उस सूरज को ढूँढना मुमकिन नहीं।
मोतियों के भ्रम में अब नहीं चुनता
मै आँसुओं के बूँद,
जुगनुओं की ताप से कोई फसल पकती नहीं।
मुझे फिक्र नही अब आईने के खरोंचों की,
मेरे हाथ के घावों का कोई मरहम नहीं।
मैंने मिला दी है जहर उसकी जड़ों में,
जिस पेड़ पर उगते थे सपनो के फूल,
अब मेरी नीदों में कोई खलल नहीं।
अब तो बस इंतज़ार है ख़त्म होने का,
इस नींद से उस नींद तक का सफर।
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