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01.18.2009
 

आस 
प्रताप नारायण सिंह


बस इतना ही करना कि,
मेरे अचेतन मन में जब तुम्हारे होने का भान उठे,
और मैं तुम्हे निःशब्द पुकारने लगूँ,
तुम मेरी पुकार की प्रतिध्वनि बन जाना

बस इतना ही करना कि,
शरद रातों में जब चाँद अपना पूरा यौवन पा ले,
और मेरा एकाकीपन उबलने लगे,
तुम मुझे छूने वाली हवाओं में घुल जाना

बस इतना ही करना कि,
स्मृति की वादियों में जब ठंडी गुबार उठे,
और मेरे प्रेम का बदन ठिठुरने लगे,
तुम मेरे दीपक कि लौ में समा जाना

बस इतना ही करना कि,
सावन में जब उमस भरी पुरवाई चले,
और मेरे मन के घावों में टीस उठने लगे,
तुम अपने गीतों के मरहम बनाना

बस इतना ही करना कि,
पीड़ा (तुमसे न मिल पाने की ) का अलख जब कभी मद्धिम पड़ने लगे,
और मैं एक पल के लिए भी भूल जाऊँ,
तुम मेरे मन की आग बन जाना

बस इतना ही करना कि,
मेरी साँसें जब मेरे सीने में डूबने लगे,
और मैं महा-प्रयाण की तैयारी करने लगूँ,
तुम मिलन की आस बन जाना


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