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ISSN 2292-9754

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02.23.2015


वक़्त -वक़्त की बात

सरिता की देवेन्द्र साही से जान-पहचान कॉलेज के के दिनों से थी। कभी दोनों में एक-दूसरे के प्रति प्यार भी जागा था।

अब देवेन्द्र साही का फिल्म उद्योग में बड़ा नाम है। उसने एक नहीं, तीन-तीन हिट फ़िल्में दी हैं। उसकी फ़िल्में साफ़-सुथरी होती हैं। सरिता के मन में इच्छा जागी कि क्यों न वह अपनी रूपवती बेटी को हीरोइन बनाने की बात देवेन्द्र साही से कहे। मन में इच्छा जागते ही उसने मुम्बई का टिकट लिया और जा पहुँची अपने पुराने मित्र के पास।

देवेन्द्र साही सरिता के मन की बात सुन कर बोला - "ये फिल्म जगत है। इसके रंग - ढंग बड़े निराले हैं, बड़े ही विचित्र हैं। सुनोगी तो दाँतों तले उँगलियाँ दबा लोगी । यहाँ हर हीरोइन को पारदर्शी कपड़े पहनने पड़ते हैं। कभी- कभी तो उसे उसे निर्वस्त्र भी ...."

"तो क्या हुआ? हम सभी कौन से वस्त्र पहन कर जन्मे थे? सभी इस संसार में नंगे ही तो आते हैं......"

सरिता अपनी बात कहे जा रही थी और देवेन्द्र साही सोचे जा रहा था कि यह वही सरिता है जो अपने तन को पूरी तरह से ढक कर कॉलेज आया करती थी।


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