अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.29.2014


नया झुकाव

1950 की बात है। राम लाल पुराने मित्र किशोरी लाल से मिलने के लिए आया। दोनों में ख़ूब संवाद हुआ, आखिर वे मुद्दत के बाद मिले थे।

किशोरी लाल का बेटा भी पास बैठा था।

राम लाल बड़ी आत्मीयता से बोला - किशोरी लाल, तेरा बेटा तो अब बहुत बड़ा लगता है। कितने साल का है?"

"दस साल का।"

"अरे वाह! मेरा बेटा भी दस साल का है। इसको क्या बनाने का तेरा इरादा है?"

"राम लाल, हम दोनों ही लाल हैं। हैं न लाल?"

"बिलकुल सही कहा है तूने। तू भी लाल और मैं भी लाल।"

"मैं इसे भी लाल बनाऊँगा।"

"क्या मतलब?"

"मेरे दोस्त, मतलब ये कि मैं इसे जवाहर लाल बनाऊँगा, जवाहर लाल नेहरू।"

"ये तो तेरा इरादा है। अपने बेटे से भी पूछ।"

"तू ही पूछ के देख ले।"

"बेटे, तू क्या बनेगा?"

 बनूँगा, उन जैसा नाम कमाऊँगा।"

"शाबाश बेटे, मेरा बेटा भी तेरी उम्र का है, वो भी जवाहर लाल बनना चाहता है।"

चौंसठ साल के बाद -

चन्द्रभान और विजय कुमार में संवाद हो रहा है, चाय पान भी हो रहा है। चन्द्रभान पूछता है - "अमर, तेरे बेटे की आयु क्या है?"

"ग्यारह, और तेरे बेटे की?"

"बारह।"

"अपने बेटे को क्या बनाओगे? इंजिनीयर, डॉक्टर या नेता?"

"इनमें कोई भी नहीं।"

"तो फिर क्या बनाओगे?"

"उसे न तो इंजिनीयर बनाऊँगा, न ही डॉक्टर और न ही नेता। उसे फिल्म स्टार बनाऊँगा, सुपर - डुपर फिल्म स्टार, अमिताभ बच्चन जैसा।"

"हाथ मिला प्यारे, तेरे - मेरे विचार कितने ज़्यादा मिलते हैं। मैं भी अपने बेटे को सुपर - डुपर फिल्म स्टार अमिताभ बच्चन जैसा ही बनाऊँगा।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें