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| 01.12.2008 |
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चेहरों पर हों कुछ उजाले सोचता हूँ
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चेहरों पर हों कुछ उजाले सोचता हूँ
लोग हों खुशीओं के पाले सोचता हूँ तन के कुछ काले जो होते दुःख नहीं था लोग हैं पर मन के काले सोचता हूँ ढूँढ लेता मैं कहीं उसका ठिकाना पाँव में पड़ते न छाले सोचता हूँ हो भले ही धर्म और मज़हब में झगड़ा पर बहें न खूं के नाले सोचता हूँ सावनी रुत है चपल पुरवाईया हैं क्यों न छायें मेघ काले सोचता हूँ ’प्राण’ दुःख आये भले ही जिंदगी मैं उमर भर डेरा न डालें सोचता हूँ |
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