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ISSN 2292-9754

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02.17.2017


सरकार की खिंचाई

 वैसे तो उपरोक्त कार्य को करने का सम्पूर्ण अधिकार केवल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को है। पर मिडिया वाले, टी.वी. वाले भी अवसर देख ये काम यदा-कदा करते रहते हैं। संसद में ये काम विपक्षी दल के अधिकार-क्षेत्र में आता है। उसे संसद के भीतर और बाहर दोनों में सतत खिंचाई करने का सौभाग्य प्राप्त है। हरेक मसले पर वह सरकार की खिंचाई करने को विवश होता है। चुप बैठे रहने पर उसे निकम्मा और कमज़ोर माना जाता है। और ऐसे विपक्ष को देश के लिए घातक समझा जाता है। कभी-कभी मेरी भी इच्छा होती है कि सरकार की जम कर खिंचाई करूँ। पर आम आदमी हूँ। डरता हूँ कि अधिकार क्षेत्र के बाहर का काम करने पर कहीं पासा न पलट जाए। । सरकार की खिंचाई के जुर्म में पुलिस-प्रशासन मेरी ही खिंचाई ना कर दे। वैसे अनाप-शनाप लिखने का जुनून मुझ पर हमेशा हावी रहा है। इसलिए सरकार से क्षमा-याचना सहित अपने तरह की एक अलग-थलग तरीक़े से सरकार की खिंचाई करने जा रहा हूँ। फिलहाल केवल "सरकार" शब्द को ही ज़रा खींच-तान लेता हूँ।

ठीक से याद नहीं कि "सरकार" शब्द अपनी ज़िंदगी में पहली बार किसके श्रीमुख से सुना। शायद ये शब्द बचपन में श्वेत-श्याम हिंदी चलचित्रों के किरदारों के मुँह से ही सुना। तब नौ-दस की उम्र रही होगी। चलिए… आपको पचास साल पीछे फ़्लैश-बैक में लिए चलते हैं। तब ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्मों का ज़माना था । देश में सारी फ़िल्में श्वेत-श्याम ही बना करती। (कलर फ़िल्म तब इजाद नहीं हुआ था) फिर वक़्त बीतता गया। विज्ञान तरक़्क़ी करते गया। और धीरे-धीरे चित्रपट ब्लैक एंड व्हाइट से कलरफ़ुल होता गया। गेवाकलर.. ईस्टमेन कलर.. फ्यूजी कलर से डिजिटल विशिष्ट कलर तक आ पहुँचा। …इसके साथ ही सिने-दर्शकों के दिलोदिमाग़ भी रंगीन होते गए। आज लोगों की आँखों में रंगीनियत इस क़दर हावी है कि श्वेत-श्याम दृश्य देखते ही वह मुँह बिचकाते कहता है- उफ़! फ़्लैश-बैक मत दिखाओ यार। प्लीज़।

सचमुच। आज की तारीख़ में ब्लैक एंड व्हाइट, फ़्लैश-बैक का पर्याय हो गया है। रंगीन फ़िल्मों में फ़्लैश-बैक के सारे सीन ब्लैक एंड व्हाइट में दिखाए जाते हैं। ये और बात है कि निजी तौर पर ऐसा नहीं होता। मुझे तो आज भी अपनी जवानी के वो प्यार भरे पल याद आते हैं तो फ़्लैश-बैक तो क्या पूरी तबियत रंगीन हो जाती है। चश्मा ज़रूर लगाता हूँ फिर भी फ़्लैश-बैक के सारे सीन अभी भी एकदम शार्प और झक रंगीन एच.डी. फ़ॉर्मेट में दिखाई देते हैं। ये मैं अपना अनुभव बता रहा हूँ। हो सकता है जिन बेचारों के जीवन में (और जवानी में) किसी "बहार" का दस्तक ना रहा हो ,उन्हें अपना फ़्लैश-बैक ब्लैक एंड व्हाइट दिखता हो। इस बारे में मैं कुछ ठोस नहीं कह सकता। ये तो वही बेचारे बता पायेंगे। वैसे जिनके फ़्लैश-बैक में कोई "बहार" नहीं उसका तो वर्तमान और भविष्य भी भूतों की तरह निश्चित ही ब्लैक एंड व्हाइट होता होगा। ये मेरी अपनी सोच है।

माफ़ कीजिये। शायद विषयांतर हो रहा हूँ। फ़्लैश-बैक से बाहर निकलने की कोशिश करता हूँ। कोशिश इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि बात अभी थोड़ी अधूरी है। दरअसल उन दिनों (बचपन के दिनों) नौ-दस की उम्र में जब घरवालों के साथ सिनेमा देखने का सिलसिला शुरू हुआ तो कई एक फ़िल्मों में देखता कि एक रौबदार रईस टाईप का व्यक्ति जो अक्सर मिल-मालिक या चाय-बागान का मालिक हुआ करता, उसे उसके मातहत बड़े ही अदब से "बड़े सरकार" कहते। अक्सर बड़े सरकार बड़ा ही ईमानदार और तहज़ीब वाला इंसान हुआ करता। वह बातें भी बड़ी-बड़ी करता। उसके पीछे हर वक़्त एक और व्यक्ति फेविकोल की तरह चिपका रहता जिसे वह "दीवानजी", "मुनीमजी" या "मुँशीजी" पुकारता। इसका काम केवल बड़े सरकार की हर बात पर हाँ में हाँ मिलाने का होता। बड़े सरकार का एक अदद बेटा भी हुआ करता जिसे घरवाले, नौकर-चाकर और मज़दूर-कामगार "छोटे सरकार", "छोटे सरकार", कहते ना अघाते। ये सरकार थोड़े भ्रष्ट और बिगड़ैल हुआ करते ये हमेशा ग़रीब तबक़ों की ज़र-जोरू और ज़मीन हथियाने की फ़िराक़ में होते। बहु-बेटियों पर टेढ़ी नज़र रखते। पर कुछ फ़िल्मों में ये अपवाद भी होते। छोटे सरकार शशि कपूर की तरह इतने अच्छे और सीधे होते कि बड़े सरकार से पूछे बिना ही मज़दूरों को बोनस बाँट देते। उनके बीच उठते-बैठते नाचते-गाते और खाते-पीते। फिर बड़े सरकार को पड़ताल करने के बाद मालूम होता कि छोटे सरकार किसी ग़रीब मजदूर या कामगार की एक अदद सलोनी लड़की के इश्क़ के पेंच में फँसा है। ऐसे किरदार को नर्गिस बख़ूबी निभाती। ख़ैर, कोई कहीं फँसे, हमें क्या? चलिए आगे बढ़ते हैं।

तो बालपन में देखे गए पिक्चर के सीन आज भी याद हैं और अच्छी तरह ये भी याद है कि तब हम बड़े-छोटे का अर्थ तो जानते पर "सरकार" का अर्थ कतई न जानते। बस अनुमान लगाते कि शायद बड़े और रईस लोगों को सरकार कहते हैं (होश सम्हालने पर जाना कि बचपन का अनुमान एकदम ही सही था) आज भी सरकार का यही अर्थ है। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि पहले रुपहले परदे पर यह "एकवचन" होता था। अब हक़ीक़त की दुनिया में ये बहुवचन हो गया है। ज्ञान-चक्षु थोड़े और खुले तो इस शब्द के और भी कई मायने सामने आये। इसके पहले कि उन मायनों का ज़िक्र हो, पहले "सरकार" शब्द की उत्त्पत्ति पर ही ग़ौर करें। मुझे नहीं मालूम कि यह हिंदी का शब्द है या उर्दू का, फ़ारसी का है अथवा अरबी का। गूगल से पूछा तो हमेशा की तरह " एबाउट-2,10,000 रिज़ल्ट " दिखाया पर एक भी रिज़ल्ट मेरे प्रश्न से मैच नहीं खाया। मुझे तो यह हमेशा अंग्रेज़ी का शब्द लगा। क्योंकि सर और कार दोनों ही अंग्रेज़ी के शब्द हैं। वैसे हिंदी में भी कई शब्द हैं- जैसे – कलाकार, चित्रकार, मूर्तिकार, आदि-आदि तो सरकार भी इस मायने में हिंदी का शब्द हो सकता है।

कहते हैं कि समय के साथ सब कुछ बदल जाता है। पर हमारे यहाँ कुछ चीज़ें कभी नहीं बदली। जैसे हमारे बच्चे आज भी अ से अनार, ब से बकरी और स से सरोता पढ़ते हैं। आज का दौर तो कान्वेंटी स्कूलों का दौर है जिसमें सबसे कठिन विषय है- हिंदी। ले-देकर बच्चे पढ़ते तो हैं पर पढ़ाई के बाद स तो याद रह जाता है पर सरोते को भूल जाते हैं। जब भी इनसे कहो कि सरोता लाना तो पहले वह पूछेगा कि ये सॉफ़्टवेयर है कि हार्डवेयर? अब तो सरोता लगभग लुप्तप्राय हो गया है। सरकार से गुज़ारिश है कि अब स से सरकार पढ़ाया जाए। क्योंकि सरकार और सरोते में काफ़ी एकरूपता है। सरोता जिस तरह कड़ी और ठोस सुपारी को एक झटके में ही काट देता है वैसे ही सरकार भी मज़बूत से मज़बूत विपक्ष को झटके में ही काट फेंकती है। सरोते का संचालन कुशल और अनुभवी हथेलियों से हो तभी सुपारी हलके प्रयास से ही कट जाता है। अनुभव की कमी हुई तो हथेलियों का लहुलुहान होना निश्चित। यही हाल सरकार के मामले में भी होता है।

सरकार एक बहुत ही प्रचलित शब्द है। हवा, पानी, भोजन, प्यार-मोहब्बत की तरह। दिन में हज़ारों बार करोड़ों लोग इसे अपनी ज़ुबान पर लाते हैं। सुबह-सबेरे अख़बार खोलो तो मुख्य समाचार में यही पढ़ना होता है। न्यूज़ चैनल देखो तो इसमें भी उद्घोषक सबसे पहले इसी शब्द का उच्चारण करता है। जिसे सुनना हमारी नियति है। उस बेचारे का तो पूरा दिन इसी के गुणगान में बीतता है। ठलहे और बेकार क़िस्म के लोग इस पर कुछ ज़्यादा ही चर्चा करते हैं। और बीच-बीच में गरियाते भी हैं। आम आदमी फ़ुर्सत के क्षण में कभी इसकी तारीफ़ करते हैं तो कभी टीका टिपण्णी। सबसे ज़्यादा वन्दनीय शब्द है यह राजनीतिज्ञों के लिए। समझिये उनके लिए यह "बिस्मिल्लाह" जैसा है।

वैसे जितना सरल यह शब्द लगता है, वैसा यह विषय के तौर पर नहीं है। तभी तो आज़ादी के सत्तर साल बाद भी इस विषय पर बामुश्किल इक्के-दुक्के फ़िल्म ही बने। मुझे तो राजनीति और अपराध की पृष्ठभूमि पर आधारित रामगोपाल वर्मा कृत और अमिताभ बच्चन अभिनीत 2005 की "सरकार" फ़िल्म ही याद पड़ती है। फिर 2008 में इन्हीं की "सरकार-2" आई। इसमें भी अमिताभ भैया ही नायक रहे। अब सुनने में आया है कि वर्माजी इसका सिक्वल "सरकार-3" बनाने जा रहे। इसमें भी अमिताभ जी मुख्य किरदार में होंगे। मुझे तो समझ ही नहीं आया कि जो अमिताभ सरकार में बतौर सांसद एक पारी भी पूरा ना कर पाए वो सरकार के तीनों फ़िल्मों में कैसे रह गए? ख़ैर ये गोपाल और उनके बीच का मामला है। हमें क्या? सरकार में वे राजपाल यादव को रखते तो भी हमें क्या फ़र्क पड़ता? इससे यह तो तय है कि सरकार पर फ़िल्म बनाना आसान काम नहीं। और इस पर गीत लिखना तो और भी कठिन काम है। इतिहास खंगाल कर देखा तो एक-दो गाने ही मिले। एक गाना फिल्म "चौदहवीं का चाँद" से है- शकील जी ने लिखा है-"बदले बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं, घर की बरबादी के आसार नज़र आते हैं" इसका अर्थ है कि सरकार जब झटका देती है तो लोग आह भी नहीं भर पाते। एक गाना और है फिल्म मनचली से-"ग़म का फ़साना, बन गया अच्छा। एक बहाना बन गया अच्छा। सरकार ने आके मेरा हाल तो पूछा।" आज भी सरकार ग़मी लोगों का (आम जनता का) हाल-चाल किसी ना किसी बहाने से ही पूछती है। कभी यह बहाना लोक सुराज अभियान होता है तो कभी ग्रामोदय अभियान।

उफ़.. अब और नहीं। रात के दो बज रहे हैं। सुबह जल्दी उठकर सरकार को, मतलब कि सरला को उसके मायके छोड़ना है। उसके भाई की शादी क़रीब है। देर तक सोता रह गया तो उठने के बाद मेरी खिंचाई तो तय! अतः शुभ रात्रि, शब्बा खैर! फिर मिलेंगे!


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