अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
04.21.2017


मीनाबाज़ार

बचपन की बातें बड़ी ही यादगार होती हैं। भुलाए न भूले। जब नौ-दस साल का था, तो मीनाबाज़ार घूमने का बड़ा ही शौक़ हुआ करता। हर साल न मालूम कहाँ-कहाँ से घूम-फिरकर मीनाबाज़ार शहर में एक बार आ ही जाता और हमेशा शहर के हृदयस्थल मोतीग्राउंड में लगता। उन दिनों यही एक बड़ा ग्राउंड हुआ करता जिसमें तरह-तरह के कार्यक्रम हुआ करते। कभी कोई मिनी सर्कस लगता तो कभी किसी जादूगर का पंडाल। कभी सात दिनों तक सायकल चलाने वाले का तम्बू गड़ जाता। तो कभी कोई बैसाखी जैसा मेला भर जाता। और दिवाली के दिनों तो मैदान में पटाखों की दूकानें सज जातीं। बारहों महीने गुलज़ार रहता मोतीग्राउंड।

मीनाबाज़ार लगते ही सारे शहर में त्यौहार सा माहौल हो जाता। अँधेरा घिरते ही मीनाबाज़ार रौशन हो जाता। सभी की आवाजाही मोतीग्राउंड की ओर हो जाती। हवाई-झूला, घोड़ेवाला चक्कर झूला, नाव-झूला, मौत का कुआँ, मौत की छलाँग वाली ऊँची सीढ़ी, ये सब मैदान के बीचों-बीच होता और उसके चारों ओर अन्य छोटे-छोटे स्टाल। बच्चों के खिलौने से लेकर चाट-भेलपूरी, पॉपकार्न वाले का स्टाल। महिलाओं की टिकली-फुंदरी से लेकर बर्तन-भांडे तक का स्टाल। और प्लास्टिक वाली की-रिंग में नाम छापने वाले से लेकर कलकत्ता के राजा स्टूडियो तक का स्टाल। बीच–बीच में मनोरंजन के और कई स्टाल होते जैसे, डांस-पार्टी का स्टाल, बंदूक से निशाना लगाने वाला स्टाल, दो सिर वाले विचित्र जानवर का स्टाल और कुछ इनामी स्टाल। आदि… आदि।

एक छोटा सा स्टाल जो अक्सर मेरा ध्यान खींचता, वो था- "पिघलने वाली लड़की" का स्टाल। बाहर दो-तीन पोस्टर लगे होते जिसमें लिखा होता- मेल्टिंग गर्ल। पिघलने वाली लड़की। एक पोस्टर में लड़की को कुर्सी में साबूत बैठी दिखाया जाता। फिर दूसरे में उसी कुर्सी में कंकाल को उसी मुद्रा में बैठे दिखाया जाता। और अन्दर से कोई अहिन्दी भाषी व्यक्ति अजीब सी हिंदी में अनवरत अनाउंस करते रहता – "देखिये। देखिये। पिघलने वाली लड़की देखिये। देखिये। कैसे मिनटों में लड़की पिघकर कंकाल हो जाती है। और मिनटों में उस कंकाल में फिर जान आ जाती है। कंकाल लड़की बन जाती है। देखिये। केवल दो आने में। कलकत्ते का काला जादू। केवल दो आने में।"

बालसुलभ कौतूहल तो था ही पर डर भी था। फिर भी एक दिन हिम्मत जुटा, टिकट ले अन्दर घुस गया। दो-चार और बच्चे सहमें-डरे से बैठे थे। जब दस-बारह दर्शक हो गए तो कर्कश कमेंट्री के साथ शो शुरू हुआ। शुरू में बहुत तेज़ लाईट जली तो एक बड़ी-बड़ी आँखों वाली लड़की को कुर्सी पर जीती-जागती विराजित पाया। फिर धीरे-धीरे लाईट डिम होती गई और डिम होती गई। कई अन्य विभिन्न रंगों के लाईट-संयोजन से दृश्य को नाटकीय और भयावह बनाते-बनाते बत्ती क्षण भर के लिए लगभग गुल कर दी गई। और फिर धीरे-धीरे लाईट ऑन की गई। अब कुर्सी पर एक कंकाल दिखने लगा। जो सचमुच का नहीं बल्कि प्लास्टिक के जैसे लगा। अब पूरे खेल को एक बार फिर रिवर्स में दिखाया गया अर्थात कंकाल को पुनः लड़की में तब्दील होते दिखाया। मुझे क्षणभर में ही समझ आ गया कि ये जादू नहीं बल्कि बिजली का खेल है। लाईट-संयोजन का कमाल है। केवल लाईट शो है।

आज ये शो किसी मीनाबाज़ार में चलता है या नहीं, मुझे नहीं मालूम। पर इन दिनों सत्ता के गलियारों में खूब चल रहा है। इस मीनाबाज़ार में शो थोड़ा उलट है। यहाँ रिवर्स क्रम पहले है। मतलब कि कंकाल से आदमी बनाया जाता है। यहाँ भी कुर्सी है - सत्ता की कुर्सी… इसमें किसी भी कंकाल को (ऐरे-गैरे नत्थू खैरे को/मरियल नेता को) बिठा दो। धीरे-धीरे उसमें मोटी चमड़ी चढ़ जाती है। वह लाल-बाल हो जाता है। हट्टा-कट्टा, रौबदार और बाहुबली हो जाता है। यहाँ जादू बिजली का नहीं बेईमानी का चलता है। फ़र्क इतना है कि लड़की वाले शो में लाईट जहाँ मेनुअल हैंडिल होता, यहाँ सब ऑटोमेटिक होता है। कंकाल के कुर्सी में विराजते ही उसके भीतर बेईमानी का ख़ून दौड़ने लगता है।

जैसे-जैसे कंकाल में भ्रष्टाचार और हरामख़ोरी का ख़ून संचरित होता है। वह हिलने-डुलने लगता है। हाथ-पैर मारने लगता है। उसमें जान आ जाती है। निरंतर वह ताक़तवर आदमी (नेता) में तब्दील होते जाता है। जितना पुख़्ता भ्रष्टाचार उतना ही पुख़्ता आदमी। यहाँ लड़की वाले शो की भाँति दूसरा वाला पार्ट नहीं होता। मतलब कि ताक़तवर आदमी (नेता) फिर से कंकाल (कंगाल) नहीं बनता। कुर्सी रहे न रहे वह सालों तक (बना) रहता है। कुर्सी छूटती है तो उसमें तुरंत ही कोई दूसरा कंकाल (ककंगाल) काबिज़ हो जाता है- आदमी (मालदार) बनने। ये क्रम अनवरत चलता रहता है।

वैसे एक बार जो कंकाल बैठ जाता है वह उठने का नाम ही नहीं लेता। कुछ तो इतने लम्बे अरसे तक बैठ जाते हैं कि उनका योनि परिवर्तन हो जाता है। आदमी से राक्षस बन जाते हैं। और ऐसे लोग पुनः कंकाल बनने की प्रक्रिया में चले जाते हैं। ये अलग बात है कि ये शो नीचे नहीं बल्कि ऊपर वाले के मीनाबाज़ार में होता है। उसे रौरव नरक के खौलते तेल में तब तक फ्राई किया जाता है। जब तक कि वो कंकाल में तब्दील न हो जाए।

मीनाबाज़ार का शो तो आधे-एक घंटे में समाप्त हो जाता था। लेकिन सत्ता के गलियारे वाला शो किसी असमाप्त कविता की तरह है। बस… झेले जाओ… झेले जाओ। वे मुफ़्त में दिखा रहे हैं और लोग मुफ़्त में देख रहे हैं। मुफ़्तख़ोरी के शौक़ ने निकम्मा कर दिया वरना इस देश के वासी भी थे काम के।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें