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ISSN 2292-9754

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10.06.2017


 जिज्ञासा

सुबह-सुबह अख़बार खोलते ही निधन वाले कालम में बिल्लू की मंद-मंद मुस्कान वाली तस्वीर देख चकित रह गया..कल रात ही तो उससे मिला था..हमेशा की तरह चुस्त-दुरुस्त अपनी गद्दीवाली कुर्सी पर पान चबाते बैठा था.. देखते ही बोला था- "अरे वर्माजी..बड़े दिनों बाद आये..बताईये क्या पैक करवाऊँ?"

तब मैंने उसे हाफ़ चिकन और तीन तंदूरी पार्सल बनाने कहा था..और उसने भट्टी की ओर मुख़ातिब हो ज़ोर से चिल्लाया था- "अरे विजय..एक हाफ़ चिकन कम तेल का और तीन तंदूरी पार्सल बना..!"

तब न वह कहीं से बीमार लगा था न ही चोटिल या गंभीर। वह आदतन पान चबाते टेबल पर सामने रखे टी.वी.को निहार रहा था। हमेशा की तरह ही पान से उसके दोनों होंठ रचे थे और होंठ के एक छोर से एक पतली लाल धार ठुड्डी की ओर बार-बार बहे जा रही थी जिसे वह तत्काल रुमाल से पोंछता। मेरी भी बरसों से आदत थी - झाँक कर एक बार टी.वी ज़रूर देखता कि वो क्या देख रहा है? कल रात तब वह कोई स्पोर्ट्स चैनल में क्रिकेट देख रहा था..शायद लाइव चल रहा था। मैंने तत्काल अपनी आँखें फेर लीं थी.. क्रिकेट से तो मुझे जन्मजात एलर्जी रही है।

चिकन के बनते तक उससे वही दो टूक बातें हुईं जो सालों से करता आ रहा था। मैंने पूछा- "क्या चल रहा है आजकल बिल्लू? सब ठीक तो है?" और उसने भी वही रटा-रटाया जवाब दिया जो वह वर्षों से देता आ रहा था- "सब ठीक है वर्मा जी.. बस..आप सब की दुआ है.. ।" तब मैंने घड़ी देखी थी- रात के नौ बज रहे थे..होटल में ग्राहकों का रेला शुरू ही हो रहा था। मेरी आदत थी, भीड़ से बचने अक्सर इसी वक़्त ही शेरे पंजाब जाता। कल भी वक़्त से गया था। तब सोचा भी न था कि सुबह उसके नूरानी चहरे को "निधन" वाले कालम में देखूँगा। मेरी आदत है कि अख़बार आते ही सबसे पहले मैं क्षेत्रीय-समाचार वाले पन्ने को पढ़ता हूँ और उसमें भी सबसे पहले "निधन" वाले स्तम्भ को। सुबह-सुबह बुरी ख़बर पढ़ने की बुरी आदत है।

जब भी किसी परिचित को इस कालम में देखता हूँ तो दुःख होता है और कभी-कभी हैरानी। बिल्लू की ख़बर ने तो एकबारगी चौंका ही दिया..अभी उसकी उम्र ही क्या थी? चालीस-पैंतालीस का रहा होगा। सरल, स्वस्थ-तंदुरुस्त और मज़बूत क़द-काठी वाले आदमी का यूँ एकाएक चले जाना, समझ ही नहीं आया। मृदुभाषी था इसलिए कोई उसके लिए पराया नहीं होता.. सबको वो अपना बना लेता था। वैसे तो लिखा है कि "हृदयाघात" से निधन हुआ पर लगता नहीं कि ऐसा हुआ होगा। न कभी उसे आज तक कराहते देखा न कभी हॉस्पिटल जाते..इसलिए विश्वास नहीं होता..।

मेरा उससे परिचय कब और कैसे हुआ, ठीक से याद नहीं पर विगत कई सालों से उसका ग्राहक रहा। पूरे शहर में वैसे तो सैकड़ों होटल और रेस्टारेंट हैं पर "शेरे पंजाब" का जवाब नहीं। यहाँ का मसालेदार चिकन-मटन, मछली बिरयानी, भुर्जी, कबाब आदि पूरे शहर में मशहूर हैं। ईश्वर जाने,मसाले में क्या-क्या नपी-तुली चीज़ डालते हैं कि तरी तो चाटने ही लायक़ होती है। कई सालों से यहाँ के डिश खा रहा हूँ पर स्वाद हमेशा ही एक सा और स्वादिष्ट रहा है..ये इसकी ख़ासियत है। शेफ़ तो वक़्त के साथ बदलते रहे पर स्वाद कभी नहीं बदला। मुझे तो इसके अलावा किसी अन्य होटल की डिश अच्छा लगी ही नहीं.. इसलिए जब भी नानवेज खाने का मूड होता, यहीं आता और हमेशा पार्सल बँधवा कर घर में ही आराम से स्वाद ले-लेकर खाता। होटल में बैठकर खाना कभी रुचिकर नहीं लगा। शोर-शराबे के बीच खाना मुझे पसंद नहीं। ऊपर से वहाँ दारू की अजीब सी गंध..ओफ़्फ़..इनके यहाँ दारू भी सर्व होती थी इसलिए कभी बैठकर नहीं खाया।

बिल्लू का यूँ एकाएक चले जाना मुझे शोकमग्न और हैरान कर गया। ऐसी ही हैरानी एक बार तब हुई थी जब बिल्लू का बाप गुज़रा था। वर्षों पहले बिल्लू की गद्दी पर उसका बाप सुच्चासिंह बैठा करता था। एकदम ही चुस्त-दुरुस्त, सज्जन, सहृदय चौड़े सीने वाला छः फुटिया गठीला गबरू जवान। हमेशा ही वह सफ़ेद पगड़ी पहनता.. सफ़ेद कुरता और सफ़ेद पाजामा। उसके चहरे से ओज टपकता था। तब बिल्लू बहुत छोटा था और बहुत कम ही गद्दी पर बैठा करता। मैं तब भी यदा-कदा बड़े भैया के लिए चिकन लेने शेरे पंजाब जाया करता..तब बिल्लू से परिचय नहीं था न ही उसके बाप से। सुच्चासिंह का व्यवहार बड़ा ही सौम्य था इसलिए वे अच्छे लगते। उन दिनों कई बार दोस्तों के साथ रात के बारह बजे के बाद भी होटल गया तो हमेशा उसे आबाद ही पाया। भगवान् जाने ग्राहकों की भीड़ कब छँटती थी और जाने कब वो दूकान बढ़ाते थे। दो-दो बजे रात तक चलते तो मैंने ख़ुद देखा था।

उन दिनों अक्सर रात को पार्सल लेने जाता तो मेरी आँखें फटी की फटी रह जातीं। बीस-पच्चीस मिनट में ही ग्राहकों का इतना रुपया गल्ले में समा जाता कि देखकर मैं चकित रह जाता। अक्सर सोचता कि इतने सारे रुपयों को वह गिनता कब होगा? सम्हालता कैसे होगा? क्योंकि अल्लसुबह होटल फिर खुल जाता। आश्चर्य होता कि यह सब वह मेंटेन कैसे करता था? ..और फिर इतने रुपयों का ये करते क्या होंगे? न वे कोई ताम-झाम करते थे न ही उनका कोई रईसों के माफ़िक पहनना-ओढ़ना, खाना-पीना था। न ही कोई पैसों का उन्हें गुरूर या रौब था। बिलकुल ही सादे लिबास में होते और सबसे सदव्यवहार ही रखते। न वे ज़्यादा पढ़े-लिखे थे न ही कोई कुटिल-चालाक कारोबारी थे। कुछ थे तो बस-धुन के पक्के और मेहनतकश ..लक्ष्मी शायद इन्हीं गुणों के चलते उन पर मेहरबान थी। इन पर रुपयों की अनवरत बरसात होती थी।

फिर आज की तरह ही एक दिन सुबह अख़बार में अचानक सरदार सुच्चासिंह की फोटो "उठावना" में देखी तो अचंभित रह गया था। उसे भी कुछ ही दिन पूर्व ही स्वस्थ-कुशल, हँसते-बोलते और चलते-फिरते देखा था। उसकी मौत का भी काफ़ी अफ़सोस हुआ था क्योंकि वह एक तमीज़दार, व्यवहार कुशल व्यक्ति था..और असमय ही निपट गया था। घटना के एक-दो महीने बाद होटल गया तो बिल्लू को बाप की गद्दी पर बैठा पाया। पहले वह बगल की कुर्सी में बैठा करता। जब वह थोड़ा बड़ा और सयाना हुआ तो उसके पापाजी जल्दी ही घर जाने लगे थे। वैसे पूरे दिन तो उसके पापा जमकर बैठते ही थे। उस दिन उसके पापा के निधन पर उसे शोक जताया था।

याद आया..शायद तभी से बिल्लू से ख़ासी जान-पहचान हुई थी। बात-बात में ही उसने बताया था कि मेरे बड़े भैया का वह कभी स्टूडेंट रहा था। बिल्लू के ज़माने में होटल ने काफ़ी तरक़्की की। उसने होटल के सारे फर्नीचर बदल दिए..नए फाल्स सीलिंग लगवाये..ख़ूबसूरत लाईटिंग व्यवस्था की..आरामदेह टेबल-कुर्सी लगवाये और बगल में ही एक बड़ा ही आधुनिक बार भी खोल लिया। जब भी उसके होटल जाता, पार्सल के बनते तक वही सब कुछ देखता और वही सब सोचता जो उसके बाप के ज़माने में सोचा करता। मसलन - इतने सारे रुपयों को गिनता कब है? हिसाब कौन रखता है? कैसे होटल मैनेज करते हैं? इतने रुपयों का क्या करते होंगे? आदि..आदि।

मेरी जिज्ञासाओं का अंत तब हुआ जब एक दिन मेरे एक अज़ीज़ मित्र ने उस परिवार की कहानी सुनाई। मेरे ये मित्र मुझसे तीन साल बड़े हैं। दरअसल वे बड़े भैया के मित्र थे पर चूँकि बड़े भैया बाहर रहा करते इसलिए वे मुझसे भी मित्रवत व्यवहार रखते। कई दशक पहले उनका "ओशो" से साक्षात्कार हुआ था। वे उनके भक्त हो गए थे। तब से शहर वाले उन्हें "स्वामी" के नाम से ही संबोधित करते। अक्सर वे गेरुआ वस्त्र ही पहनते। वैसे उनका पूरा व्यक्तित्व वैराग्य वाला ही था..उनका ज्ञान काफी गूढ़ और विस्तृत था। वे प्रवचन बढ़िया करते। छोटे-बड़े सभी को प्यार करते। लोग उनसे अपनी परेशानी, कष्ट, दुःख कहते और उम्मीद करते कि स्वामीजी चुटकियों में उन्हें उबार देंगे..और ऐसा होता भी था। उनकी हथेलियों में कोई जादू तो अवश्य था। जिनके सिर पर हाथ फेरते, उसके दिन फिर जाते। वे काफ़ी हँसोड़ और मज़ाकिया भी थे। उनका मेरे घर आना-जाना लगा ही रहता। कभी घंटों भी बैठ जाते तो कभी आते ही कहते- "चल..अमुक ढाबा जायेंगे..वहाँ की जलेबी और खीर खाकर आयेंगे।" खाने का उन्हें काफ़ी शौक़ था, शुद्ध शाकाहारी थे। फिर अचानक कई सालों तक उनसे न जाने कैसे संपर्क टूट सा गया।

दुबारा जब संपर्क हुआ तो वह अक्सर एक नाम का ज़िक्र बार-बार करते "दर्शन" का। तब मैं नहीं जानता था कि कौन है ये दर्शन? आते-जाते हमेशा कहता कि दर्शन के पास गया था.. दर्शन आया था.. दर्शन ने बुलाया है.. ये दर्शन की सायकल उठा लाया हूँ.. दर्शन के यहाँ खा लिया.. आदि-आदि। उनकी बातचीत से इतना ज़रूर जान गया था कि दर्शन किसी रेस्तरां या होटल का मालिक है। एक दिन उसके नाम के साथ बिल्लू का ज़िक्र आया तब उनसे पूछा था कि कौन है ये दर्शन? तब बताया कि बिल्लू का छोटा भाई है दर्शन और स्टेशन रोड पर उसका होटल है जहाँ सुबह से देर रात तक पोहा, समोसा, जलेबी, भजिया, मिक्सचर,चाय-काफी, डोसा-इडली आदि मिलता है। एक दिन मेरे मित्र मुझे उसकी दूकान ले गए। रात के दस बज रहे थे। जैसे ही मित्र के साथ होटल के गेट पर पहुँचा, एक साधारण डीलडौल का बिना पगड़ीवाला गोरा सरदार हाथ जोड़ते- "स्वामी जी, नमस्कार" कहते आया और मित्र के चरण छूने लगा। उसने उन्हें अपनी गद्दी पर बिठाया और गरमा-गरम कुछ खाने-पीने का आग्रह करते नौकर को दो काफ़ी बनाने का आर्डर दिया। उनकी आपसी बातचीत से लगा कि मित्र का यहाँ नियमित आना-जाना था। ग्राहकों की भारी भीड़ ने एकबारगी मुझे शेरे पंजाब की याद दिला दी। यहाँ भी गल्ला रुपयों से मुँह तक भरने को था। रुपयों की बरसात हो रही थी। फिर वही पुरानी जिज्ञासाओं ने अंगड़ाई ली..और मैं सोचने लगा...।

मित्र ताड़ गए.. मुझे घर छोड़ने आये तो कुछ देर शांत बैठे फिर बोले- "तुझे हैरत है ना कि इतने सारे रुपयों का ये करते क्या हैं? कब गिनते हैं? कैसे हिसाब रखते है? कैसे होटल मैनेज करते हैं? तो सुन.. एक बार बातों ही बातों में दर्शन ने एक रोचक घटना का ज़िक्र किया था और जो बात उसने मुझे बताई वो आज मैं तुम्हें बताता हूँ। इनका पूरा परिवार शुरू से अच्छे संस्कारों से बँधा रहा है। बाप ने बचपन से इनमें ऐसे संस्कार डाले कि ये कभी उनसे डिगे नहीं। हर स्थिति में ये ख़ुश रहना जानते थे। एक ज़माने में ये बड़े ही विपन्न हुआ करते थे। मेहनत-मज़दूरी कर आज इस मुक़ाम पर पहुँचे हैं.. धन-धान्य से भरपूर हैं। उनके पापा अक्सर रात नौ बजे ही होटल से घर चले जाते और वे दोनों भाई रात लगभग एक-डेढ़ बजे ही घर पहुँचते थे। अक्सर बिल्लू बाद में आता, दर्शन ही पहले दूकान बढ़ाकर पहुँचता। आते ही रुपयों की सारी गड्डियाँ जो दूकान में वे पहले से बनाकर रखे होते, पापा को थमाते। पापाजी दीवान के पास वाले कुर्सी पर बैठे कुछ हिसाब-किताब करते रहते। सामने रखे टेबल पर नोटों की गड्डियों को वे क्रमवार जमाते.. हज़ार का, पाँच सौ का, सौ का, पचास का, बीस का, दस का, पाँच का..आदि-आदि।

तत्पश्चात किचन में जाकर दोनों भाई खाते-पीते फिर अपने-अपने कमरे में सोने चले जाते तो सुबह छः बजे ही उठते। कभी-कभार दर्शन दो-तीन बजे रात को बाथरूम जाने उठता तो पापाजी के कमरे में रोशनी देख उधर झाँक आता। तब पापा उन गड्डियों को अपने दीवान में जमाते दीखते.. फिर उसी के ऊपर बिस्तर लगा सो जाते..और ताज्जुब होता कि सुबह सबसे पहले पापा ही उठते। सबेरे जल्दी-जल्दी चाय-नाश्ता कर दोनों पुनः एक बार पापाजी के पास हाज़िर होते और अपनी ज़रूरत के हिसाब से रुपयों की माँग करते। वे मिनटों में दोनों भाईयों को गड्डियाँ थमा देते और दोनों अपनी-अपनी स्कूटी से दूकान के लिए निकल पड़ते तो फिर रात को ही मिलते। यही रोज़ की दिनचर्या थी।

दर्शन थोड़े चुलबुले स्वभाव का था.. शरारती भी था। एक दिन उसे शरारत सूझी और पापाजी के बिस्तर के नीचे से कुछ नोटों की गड्डियाँ चुराकर अपने सिरहाने रख सोने की कोशिश करने लगा। वो देखना चाहता था कि पापा को पता चलता भी है या नहीं। वह करवटें बदलता रहा पर नींद आने का नाम नहीं ले रही थी। बिस्तर से वह उठा और सिरहाने से गड्डी निकाल उसे गिना। पूरे सत्रह हज़ार थे.. फिर बिस्तर के नीचे फैलाकर उस पर सोने की चेष्टा करने लगा किन्तु नींद जैसे ग़ायब ही हो गई थी। पूरी रात वह सो न सका। जैसे-तैसे सुबह हुई तो रोज़ की तरह ख़रीदारी के लिए रुपया लेने पापाजी के पास गया।

दर्शन ने रुपये माँगे तो बिस्तर के नीचे से गड्डी निकाल दे दी। बिल्लू को भी नोटों की गड्डियाँ दीं। बार-बार वे बिस्तर पर बिछे नोटों की गड्डियों को घूर रहे थे। दर्शन को लगा कि वह अब पकड़ा गया..तब पकड़ गया..पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। पापा ने दीवान बंद कर बिस्तर ठीक किया और दूध लेने चले गए। दर्शन को राहत तो मिली पर पापा की बेपरवाही पर ग़ुस्सा भी आया। रात को पापाजी से भेंट हुई तो दर्शन ने अपनी भड़ास निकाली, कहा- "पापाजी... आप इतने रुपयों के ऊपर बिस्तर लगा चैन से सो कैसे जाते हैं? कल रात मैंने आपके बिस्तर के नीचे से सत्रह हज़ार रुपये चुराए और आपको पता तक न चला। क्या आप हिसाब-किताब करके नहीं रखते? मुझे तो इतनी ही रक़म ने रात भर सोने नहीं दिया। पूरी रात जागता रहा। भगवान् जाने आप इस अकूत ख़ज़ाने के ऊपर कैसे सो जाते हैं?.. कैसे आपको नींद आ जाती है?"

तब पापा ने जवाब दिया- " बेटा! मुझे तुम दोनों पर इतना एतबार है जितना कि ख़ुद पर नहीं.. और ये संस्कार ही हैं कि तुमने जो किया उसे ईमानदारी से बता भी दिया। इससे साफ़ ज़ाहिर है कि चोरी, तुम्हारी मंशा ही नहीं थी। तुम केवल देखना चाहते थे कि मैं हिसाब-किताब रखता हूँ या नहीं, और सच कहूँ तो मैं सचमुच कभी कोई हिसाब नहीं रखता। तुम लोग लाकर देते हो, मैं जस का तस उसे दीवान में डाल देता हूँ। जितना माँगते हो, दे देता हूँ। सब कुछ तुम्हारा ही तो है.. गिनता रहूँगा तो सोऊँगा कब? अब रही बात तुम्हारे न सो पाने की तो बता दूँ – तुम्हारे मन में इस बात ने घर कर रखा था कि चोरी के रुपये हैं। इसलिए तुम सो न सके.. तुम्हें नींद नहीं आई। ग़लत तरीक़े से हासिल किया गया धन होगा तो नींद कभी आएगी भी नहीं। इसीलिए तो अक्सर भ्रष्ट और काला बाज़ारियों की नींद हमेशा हराम रहती है। मेहनत की कमाई है, इसलिए मैं चैन की नींद सोता हूँ।

“एक बात और.. महीने में एक दिन मैं झोले में लाखों रुपये ले बाहर जाता हूँ तो शायद तुम दोनों सोचते हो मैं बैंक में जमा करता होऊँगा। किन्तु सच्चाई ये है कि मैं कभी कोई बैंक गया ही नहीं बल्कि वह रुपये कुछ ग़ैर सरकारी संस्थाओं को नियमित रूप से हर महीने दान कर आता हूँ जो समाज के ज़रूरतमंद लोगों के लिए अच्छा काम करते हैं। बेहिसाब पैसों का पूरा–पूरा और सही उपयोग करता हूँ। किसी ने कहा है न- ‘तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा’ बिलकुल ही ठीक कहा है। दान-पुण्य करने से धन तत्काल ही कई गुणित हो जाता है, और हमारी बरक़त का यही रहस्य है। मेहनत, ईमानदारी, लगन और दान।"

मित्र की कहानी ने तब मेरी सारी जिज्ञासाओं को शांत कर दिया था।

अख़बार अभी भी मेरे हाथ में है.. और बिल्लू निधन के कालम से मंद-मंद मुस्कुराते निहार रहा है। अब वह कभी नहीं पूछेगा - "क्या पैक करना है वर्मा जी?" क्योंकि ज़िंदगी की बाज़ी में वह हमेशा के लिए “पैक” हो गया है..!


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