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03.28.2008
 

भविष्य को सँवारें - कलियों को मुस्कुराने दें !
प्रमिला कटरपंच


आज कल यह एक आम बात हो गई है कि क्या घर और क्या बाहर, बच्चों को लेकर शिकवा व शिकायत चलाया जाता है। अभी उस दिन हमारे घर एक मित्र सपरिवार आये थे। हमने पूछा भाई क्या बात है आज इधर का रास्ता कैसे भूल गये, तो इससे पहले कि हम उनके स्वागत के लिये अपना हाथ बढ़ाते, उनकी पत्नी तपाक से बोलीं, “बहन जी क्या बताएँ इन बच्चों ने तो नाक में दम कर रखा है सारा घर सर पर उठा रखा है। जमाना ही ऐसा आ गया है।  यह कोई एक घटना नहीं, बल्कि हर घर और समाज में दोहराई जाने वाली कहानी है। जमाने को दोष देकर बच निकलने वालों की बात हमें पसन्द नहीं है। यह हमारी कमजोरी है - हमारी और आपकी। हमारी मान्यता है कि बच्चों को किसी भी दिशा में मोड़ने का दायित्व हमारा अपना है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि बच्चा कुएँ की आवाज होता है। जैसा वह देखता है या सुनता है वैसा ही वह करता है। जैसी भावना का बीजोरोपण हम बच्चों के कच्चे मस्तिष्क पर करेंगे, उसी का वृक्ष आगे चलकर पुष्पित एवं पल्लवित होगा।

इतिहास की कहानियों और साहित्य के अनेक पात्र इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि बच्चों के चरित्र, उनकी आदत, उनका स्वभाव और सबसे ऊपर उनके व्यक्तित्व का निर्माण बचपन से ही किया जा सकता है। यह बात किसी सपने को सच कर दिखाने वाली परियों की कहानी जैसी नहीं है, बल्कि व्यवहारिकता धरातल पर शतप्रतिशत क्रियान्वित करने वाली है। उत्तरप्रदेश के किसी गाँव से रामू नामक बच्चे को जब एक भेड़िया उठाकर ले गया और भेड़ियों के बीच में रहा और पला तो उसकी आदत, उसका स्वभाव और लगभग पूरा व्यक्तित्व ही भेड़िया जैसा ही बन गया। शिवाजी की अदम्य बहादुरी के पीछे माता जीजाबाई के योगदान को सभी स्वीकार करते हैं। अंग्रेज़ी के रोमाँटिक कवि वर्ड्‌सवर्थने तो लूसी ग्रे नामक बाल पात्र के जीवन निर्माण का पूरा उत्तरदायित्व ही प्रकृति पर छोड़ दिया। स्वयं वर्ड्‌सवर्थने प्रकृति की उपासना का पाठ बाल्यकाल में ही सीखा था और उसी के आधार पर वे विश्व साहित्य में अपने प्रकृति प्रेम के मौलिक दर्शन के लिये अमर रहे। वर्ड्‌सवर्थका हृदय आकाश में इन्द्रधनुष को देखकर प्रसन्नता से उछल पड़ा था, खेत में चुपचाप अकेली ग्राम बाला को फसल काटते और गाना गाते देखकर वह अलौकिक सुख प्राप्त करता था। हमारे और आपके पड़ोस में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहाँ बच्चों के चरित्र का निर्माण, उनकी संगत, स्कूल और घर के वातावरण के अनुसार ही रहता है। बच्चे हमारे देश के भविष्य हैं। उन्हीं के कन्धों पर आने वाले देश की तस्वीर निहित है। हमारा यह परम आवश्यक कर्त्तव्य है कि हम उन्हें ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करने में सहायता प्रदान करें, जो हमारे समाज और देश के लिये लाभकारी हो।

 

यह एक मनोवैज्ञनिक तथ्य है कि कोई बात सीखने में नकल करने की प्रवृत्ति प्रमुख रहती है। अनेक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया जा चुका है कि बच्चों में कोई बात सीखने के लिये नकल करने वाली प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है। बच्चा जैसा देखता है, वैसा ही वह स्वयं करता है। इस प्रकार उसमें सीखने की आदत पक्की बनती है। एक दिन तो यह देखकर मुझे हैरान रहना पड़ा कि मेरी दो साल की भतीजी पेन खोलकर मेरी रायटिंग पैड पर आड़ी तिरछी रेखाए खींच रही थी। कभी किसी ने उसे नहीं बताया कि पेन और रायटिंग पेन लिखने के काम आते हैं, परन्तु उसने यह होते हुए एवं करते हुए देखा और फिर उसी अनुसार नकल करने की कोशिश की। इस संदर्भ में यह आवश्यक है कि हमें कोई भी बात अच्छी या बुरी यदि बच्चों को सिखानी है और उनमें पनपनानी है तो घर में बड़े लोगों को अपनी आदत, व्यवहार और कार्य प्रणाली पर विशेष रूप से सजग रहना पड़ेगा और हर कार्य एक आदर्श रूप में करना होगा, जिससे घर के छोटे बच्चे इस काम को नकल द्वारा सीखने की प्रवृत्ति के अन्तर्गत उसे अपने जीवन का अंग बना लें। उनकी मनोभावना और रुचियों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है, ताकि कोई अवांछित रुचि और भावना उनकी मस्तिष्क में स्थान न बना पाए। आप स्वयं वही कीजिए, जो आप अपने बच्चों से चाहते हैं। यदि आप चाहते हैं कि बच्चे सुबह जल्दी उठें, ईश्वर की अराधना करें, लगन से अध्ययन करें तथा सुरुचिपूर्ण ढंग से खेलें तो पहले हमको और आपको उनके समक्ष स्वयं उदाहरण पेश करना होगा, तभी हमारी आशा के अनुरूप स्वस्थ, चरित्रवान और स्वावलम्बी बच्चे बनेंगे।

घर में और घर के बाहर बच्चों को उनके अस्तित्व का बोध  कराना और उनके महत्व को स्वयं स्वीकार करने की भावना का उन्हें एहसास कराना अत्यन्त आवश्यक है। बच्चों को यह मालूम होने देना चाहिए कि वह घर और परिवार की एक आवश्यक और महत्वपूर्ण ईकाई हैं तथा परिवारिक गतिविधियों का एक आवश्यक अंग हैं। उनके क्रियाकलापों, पढ़ाई -लिखाई और खेल-कूद में भाग लेकर हम उनके अहम्‌ की भावना को संतुष्ट कर सकते हैं। बच्चों से बात करते समय हम यह ध्यान रखें कि हमारी बातों में उनके प्रति प्यार और ममता छलकती है। उनके स्कूल की और उनके दोस्तों की घटनाएँ उनसे पूछिए और विशेष रुचि लेकर उन्हें सुनिए - देखिए वे कितने प्रसन्न होते हैं। उनके साथ खेलिये और खेल ही खेल में उन्हें कोई नया अच्छा सिखाने का प्रयास कीजिये। वह तुरन्त सीख जाएँगे। आप घूमने जाएँ तो बच्चों को भी अपने साथ लेते जाएँ। घर में खाने में क्या बने, कौन सी सब्जी बने, क्या पकवान उन्हें पसंद है और किस प्रकार उन्हें तैयार किया जाए, इस विषय में भी हमें बच्चों की रुचि पूछी जानी चाहिये। घर में पत्र पत्रिकाएँ मँगाते समय उनकी रुचि की पत्र-पत्रिकाएँ अवश्य मँगाइए और उन्हें बच्चों के साथ मिलकर पढ़िए और पढ़ाइए। उनके लिये कपड़े बनवाते समय उनकी भावना पर ध्यान दीजिये कि उन्हें कौन से रंग का कैसा कपड़ा पसंद है। इससे बच्चे प्रसन्न रहते हैं। इस प्रकार की छोटी-छोटी बातों से घर में ऐसा वातावरण बनेगा कि बच्चे स्वयं को उस घर और परिवार की एक आवश्यक इकाई समझने लगेंगे और उनमें उत्तरदायित्व की एक नई भावना प्रस्फुटित होगी। कोई काम उन्हें सौंप कर तो देखें! बच्चे अपनी पूरी क्षमता से अपने जिम्मेदारी का निर्वाह इस प्रकार करेंगे कि आपको भी आश्चर्य मिश्रित संतुष्टि होगी। हम बच्चों पर अपनी बातें कभी नहीं थोपें। उनकी इच्छा को पहले जानें और उसीके अनुसार आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करें। वह वैज्ञानिक बनना चाहते हैं या अच्छा खिलाड़ी, यह उन्हें तय करने दीजिये। साधारणत: ज्यादातर माँ-बाप अपनी इच्छा अपने बच्चों पर थोपते हैं, वे चाहते हैं कि उनका बच्चा इंजीनियर या डॉक्टर बने, जबकि बच्चा एक अच्छा चित्रकार बनना चाहता है, वह एक लेखक या कवि बनना चाहता है। यदि हम बच्चों को वह करने देंगे, जो उनकी रुचि और इच्छा के अनुसार है उस क्षेत्र में उन्हें बेहतर सफलता प्राप्त होगी। किसी भी क्षेत्र में वह जाएँ, उत्कृष्टता उनके स्वभाव में होनी चाहिए, यही हम चाहते हैं और हम कर भी सकते हैं। उन्हें अपना दिशा निर्धारण स्वयं करने दें, हाँ आवश्यकता पड़ने पर अपने अनुभव के आधार पर परामर्श अवश्य दें तथा उसके निर्णय के पक्ष और विपक्ष के सभी पहलुओं को उसको समझाएँ।

स्वावलंबन की भावना का बीजारोपण भी बच्चों की मस्तिष्क पर प्रारंभ से करना उसके भावी जीवन की रूपरेखा ही नहीं, बल्कि आधारशिला है। शुरू से ही उन्हें अपना काम स्वयं करने का परामर्श और अवसर प्रदान कीजिये। इसके लिये सबसे पहले आवश्यक होगा कि स्वयं को दूसरों को आदेश देने की आदत का परित्याग करें। आप स्वयं अपना काम कीजिये और बच्चों को भी उनका काम उन्हें खुद करने दीजिये। जहाँ आवश्यक हो, वहाँ आप उनकी सहायता कर सकते हैं। साधारणत: कुछ छोटी-छोटी बातों की ओर हमें सोचना होगा। घर में बच्चों के लिये छोटी-छोटी मेज और कुर्सियाँ बनवा दें, जिन्हें वह स्वयं व्यवस्थित रख सकें। खाने-पीने की चीजें तथा पानी पीने के बर्तन किसी ऊँचे स्थान पर नहीं रखकर ऐसी जगह नीचे रखें, जहाँ बच्चों का हाथ आसानी से पहुँच सके। कमरे में कपड़े टाँगने की खूँटियाँ और दरवाजे बंद करने के कुंदे उनकी ऊँचाई के अनुसार ही लगवाएँ। ऐसा करने से घर में बच्चों को अपना सभी काम स्वयं करने के लिये प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलेगा तथा स्वावलंबी बनने के मार्ग पर अग्रसर होंगे- हमारे और आपके ऊपर निर्भर रहकर असहाय और निराश नहीं बनेंगे, बल्कि उत्साही और आत्म-विश्वास से भरपूर नागरिक बनेंगे। हमारे समाज के उपवन में उग रही इन नन्हीं-मुन्नी कलियों को हम स्वतंत्रता का वातावरण, सरसता का व्यवहार तथा स्वावलंबन की प्रवृत्ति की त्रिवेणी में मुस्कराते हुए अवगाहन करने दें, ताकि वह समाज के स्वस्थ, सुन्दर एवं सुचरित्र पुष्प बनकर राष्ट्र और समाज के प्रति उत्तरदायित्वों का निर्वाह कर सकें। हम उनके प्रति अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करें और विश्वास रखें कि वह भी अपने कर्त्तव्य पालन की दिशा में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। कलियों को मुस्कराने दें, तभी हम उनकी सुगंध से मोहित और प्रभावित होंगे!


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