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03.28.2008
 

जंगल के महाराज
प्रमिला कटरपंच


बड़ी शान से बैठ गये हैं जंगल के महाराज
कहीं प्रजा को कष्ट नहीं है, सोच रहे वनराज।

ऐसी कोई स्कीम बनायें, सबकी होय भलाई,
हिल-मिलकर सब रहें शांत, मस्ती से खाएँ मलाई।

अनुशासित रह मेहनत से सब अपना-अपना काम करें,
और समय की पाबंदी रख कठिनाई से नहीं डरें।

स्वावलंबन का पाठ पढ़ें तो सुधरे हालत माली,
हँसी-खुशी से आँगन में हम रोज मनाएँ दीवाली।

स्वाभिमान से रहें सभी, पर सबको न्याय मिले,
निडर बनें ताकत में गरजें, सबको खुशी मिले।


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