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03.28.2008
 

बुद्धि और विद्या के लोक-देव : गणेश
प्रमिला कटरपंच और एम. सी. कटरपंच


गणेश हमारे देश में लोक देवता के रूप में पूजे जाते हैं। कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक गणेशजी की पूजा होती है। वे बुद्धि और विद्या के देवता समझे जाते हैं। ऋद्धि और सिद्धी के स्वामी और सुख-समृद्धि देने वाले देव भी गणेश ही हैं। लड्‌डू उनका प्रिय भोजन है और चूहा उनकी सवारी। लम्बे चौड़े कान और मस्तक पर लगी सूँड हमारी उस पौराणिक कहानी को प्रकट करती है कि स्वयं शिवजी ने अपने पुत्रा गणेश के सिर पर हाथी का सिर काटकर लगा दिया था। शिव और पार्वती के दो पुत्रा गणेश और कर्तिकेय हैं। कार्तिकेय को शक्ति का देवता माना जाता है।

दक्षिण में उन्हें भगवान सुब्रामणयम के नाम से जाना जाता है। उत्तर भारत में कार्तिकेय इतने प्रसिद्ध नहीं हैं, जितने गणेश। राजस्थान, मालवा, विदर्भ और महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी एक महत्वपूर्ण त्यौहार के रूप में मनायी जाती है। राजस्थान और उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में गणेश चतुर्थी को डण्डा चौथ भी कहते हैं और वहाँ स्कूल के बच्चे हाथों में रंग-बिरंगे छोटे-छोटे डण्डे बजाते हुए और चौपाइयाँ सुनाते हुए गली-गली घूमते नजर आएँगे। इन चौपाइयों में गणेश की महिमा गाई जाती है। डण्डे बजाते तथा गीत गाते हुए बच्चों की टोली घर-घर से लड्‌डू खाती हुई आगे ब्ढ़ती जाती हैं। महाराष्ट्र और मालवा में गणेशजी का जुलूस निकाला जाता है और अनेक झाँकियाँ प्रदiर्शत की जाती हैं। गली-गली और चौराहों-तिराहों पर गणेशजी की स्थापना होती है और वहाँ विभिन्न प्रकार की रोचक झाँकियाँ सजाई जाती हैं। इन सब कार्यक्रमों के लिये घर-घर से चंदा एकत्रित किया जाता है और सभी नर-नारी बुद्धि और विद्या के लोक-देवता गणेशजी की पूजा में अपना योगदान देते हैं।

गणेश विद्या के देव हैं। बच्चों को विद्या अध्ययन के लिये जब स्कूल में भेजा जाता है तो उनकी पट्‌टी पर सबसे पहले श्रीगणेशाय नम: लिखा जाता है। अन्य कोई माँगलिक कार्य करने पर भी यही सूत्र लिखा जाता है, जिसका अर्थ है हम श्री गणेशजी को नमस्कार करते हैं। विद्या के देव के प्रति श्रद्धा और नम्रता का भाव रखकर ही हम विद्या ग्रहण कर सकते हैं। विद्या  हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण कार्य करती है, जिससे हमारे ज्ञान और बुद्धि आलोकित होते हैं। जीवन में विद्या ग्रहण करना हमारे जीवन की आधारशिला है। अच्छी शुरूआत, अच्छा परिणाम देती है। किसी कार्य को प्रारंभ करने को श्रीगणेश करना कहते हैं। विद्या हमारे जीवन की प्रारंभिक सम्पत्ति है, जिसके देवता गणेशजी की पूजा करके हम अपने उज्ज्वल जीवन की प्रार्थना और कामना करते हैं।

विद्या का आधार स्तंभ बुद्धि होती है, जो मस्तिष्क में विराजमान होती है। गणेश बुद्धि के भी देवता हैं। प्रत्येक माँगलिक कार्य में सर्वप्रथम गणेशजी की पूजा करके हम अपनी सामाजिक मान्यता को प्रकट करते हैं कि मनुष्य में बुद्धि ही प्रधान है और समाज के कल्याण के लिये भी यह आवश्यक है। शक्ति तो पशुओं में भी होती है। पशुओं के ऊपर मनुष्य को रखने वाली चीज बुद्धि है। बुद्धि की रक्षा करने के लिये आवश्यक है शक्ति, परन्तु शक्ति को अक्षुण्ण रखने के लिये बुद्धि अनिवार्य है। गणेशजी के सिर पर हाथी का मस्तक है। हाथी बहुत बुद्धिमान जानवर होता है। बुद्धि सिर में विराजती है। अत: गणेश के शरीर पर हाथी का सिर उन्हें बुद्धि के देवता के रूप में प्रतिष्ठित करता है। परन्तु केवल बुद्धि ही सब कुछ नहीं है। बुद्धि हमें अच्छे विचार प्रदान कर सकती है, अच्छे-बुरे का ज्ञान करा सकती है, भलाई-बुराई में भेद बता सकती है, समाज कल्याण की अनेक योजनाएँ सुझा सकती हैं। परन्तु केवल अच्छा विचार आना अथवा अच्छी योजनाओं की प्रेरणा प्रकट होना ही पर्याप्त नहीं है। उस पर अमल किया जाना भी आवश्यक है। विचार को कर्म की आवश्यकता होती है। अच्छे आकि|टेक्ट को अच्छे कारीगर आवश्यक होते हैं। अत: सब बुद्धि से प्रेरित विचारों को कार्यान्वित करने के लिये कर्म की आवश्यकता होती है। गणेश के सिर पर आसीन हाथी के सूँड को कर कहते हैं। सूँड ही हाथी का हाथ है। हाथी समस्त कार्य अपनी सूँड से करता है। इसकी सूँड ही सदैव किसी न किसी कार्य के व्यस्त रहती है। हाथी के सूँड में बहुत शक्ति होती है। वे आवश्यकता पड़ने पर बड़े-बड़े पेड़ों को भी उखाड़ सकता है। अत: गणेश के शरीर पर हाथी का सिर धारण करना बुद्धि, कर्म और शक्ति का प्रतीक है। सिर में ही सूँड जुड़ी हुई होती है, जिसका अर्थ यह है कि बुद्धि, कर्म और शक्ति में सामंजस्य होना चाहिये। यह सामंजस्य होने में हम अपने लक्ष्य को सफलता के साथ प्राप्त कर सकते हैं। मानव जीवन के लिये गणेश का यह संदेश बहुत कल्याणकारी है कि बुद्धि, कर्म और शक्ति का सामंजस्य रखकर अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहो तो सफलता हमसे दूर नहीं जा सकती। इस प्रकार गणेशजी सफलता के देवता भी हैं। बिना किसी रुकावट के लक्ष्य प्राप्त कर लेना ही सफलता होती है। लक्ष्य प्राप्ति में आने वाली दिक्कतों को दूर कर देने पर ही हमें सफलता मिलती है, इसीलिये गणेशजी को विघ्न विनाशक और मंगलकारक देवता समझा जाता है। किसी भी माँगलिक कार्य पर श्री गणेशजी की पूजा सबसे पहले करने के पीछे हमारी यह भावना अंतर्निहित होती है कि हमारा यह माँगलिक कार्य बिना किसी बिघ्न और बाधा के सफलतापूर्वक सम्पन्न हो जो। इस प्रकार वह हमारे माँगलिक लोक देव के रूप में भी पूजे जाते हैं।

गणेशजी के बड़े-बड़े और चौड़े कान हमें उनकी गहराई और सहनशीलता को उद्‌घाटित करते हैं। सबकी बात को ध्यान से सुनना भी जीवन की सफलता के लिये बहुत जरूरी है। अच्छी और बुरी दोनों ही बातें सुनना आसान काम नहीं है। बुरी बात सुनकर भी गुस्सा नहीं आना चाहिये। गणेश के लम्बे-चौड़े कान हमें धैर्य और संयम का पाठ पढ़ाते हैं। उनका लम्बा-चौड़ा उदर भी हमें यही गुण सिखाता है कि हम हर प्रकार की अच्छी और बुरी बात सुनकर उन्हें अपने पेट में पचा लें। गणेश के मोटे पेट में उनके हृदय की गहनता प्रकट होती है। हृदय की गहराई हमें संयमी और सहनशील बनाती है, जो मानव जीवन की सफलता की घ्जी है। ऋद्धी और सिद्धी गणेश की दो पत्नियाँ हैं, जिसके प्रतिकात्मक भाव धन, सम्पत्ति और सफलता के रूप को प्रकाशित करते हैं। गणेश की पूजा करके हम सुख-समृद्धि और जीवन की सफलता की कामना करते हैं। लड्‌डू गणेशजी का प्रिय भोजन है और उनकी पूजा सदैव लड्डुओं से ही की जाती है। लड्‌डू को मोदकभी कहते हैं (मोदक प्रिय मुद मंगल दाता), जिसका अर्थ ऐसा पदार्थ है, जो हमें मोद और प्रसन्नता से भर दे। लड्‌डू खाने में अच्छा लगता है। अच्छी चीज ग्रहण करने पर ही हमारा शरीर भी स्वस्थ, सुन्दर और प्रसन्न बना रहता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क बैठता और स्वस्थ मस्तिष्क में ही अवतरित होते हैं अच्छे विचार- कल्याणकारी विचार। अत: गणेश लड्‌डू खाकर बुद्धि और शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं, जिससे हमारा कर्म सार्थक और वांछित परिणाम पा सकता है। बुद्धि और विद्या के अपने इस लोक देवता को हमारा शत्‌-शत्‌ प्रणाम! हे गणेश हमें बुद्धि, शक्ति और सत्कार्य करने के लिये प्रेरणा और क्षमता प्रदान करें।


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