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पहला विरह है यह पहले मिलन का,
लगता है यह विरह है धरती व गगन का;
खुशबू अब जाती रही अपनी चमन की,
जीवन में न चमक रही अब कंचन की।
अकेलेपन का ही दर्द अब रह सा गया,
मिलन की मिठास को विरह ही खा गया;
अभी-अभी बसंत था वो कहाँ खो गया,
देखते ही देखते अभी पतझड़ आ गया।
यादों की परिधि में जिन्दगी सिमट गई,
धड़कन जो थी ज़िगर की वही बिछड़ गई;
सुबह होने से पहले ही फिर शाम हो गई,
कली खिलते-खिलते अधखिली रह गई।
वेदना विरह की अब कम होने से रही,
मिलन की मिठास अब मिलने से रही;
जो बात है उसमें इस तस्वीर में नहीं,
सदाबहार शायद मेरी तकदीर में नहीं।
विरह के बाद फिर मिलन होगा कभी,
इसी आस से बैठा है सूखी डाल पे अलि;
बनेगी फूल फिर इस उपवन की कली,
आयेगी बहार जीवन जो में मिली थी कभी
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