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06.30.2008
 
तुम्हारे लिए
प्रकाश यादव निर्भीक

मैं अपने इस,
मरुस्थल जीवन में,
जीता रहूँगा-
केक्टसोँ की तरह,
पानी के अभाव में,
झुलसता ही रहूँगा,
चिलचिलाती धुप में,
रजकण के ऊपर,
प्रचण्ड गर्मी में,
और चलता ही रहूँगा,
मृगों की भांति,
प्यास बुझाने की आस में,
मृगतृष्णा के पीछे,
साथ ही पी लूँगा जहर,
अमृत ही समझकर,
और अन्तिम साँस तक,
जीता रहूँगा मैं,
तुम्हारे लिए,
सिर्फ तुम्हारे लिए...


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