मैं अपने इस,
मरुस्थल जीवन में,
जीता रहूँगा-
केक्टसोँ की तरह,
पानी के अभाव में,
झुलसता ही रहूँगा,
चिलचिलाती धुप में,
रजकण के ऊपर,
प्रचण्ड गर्मी में,
और चलता ही रहूँगा,
मृगों की भांति,
प्यास बुझाने की आस में,
मृगतृष्णा के पीछे,
साथ ही पी लूँगा जहर,
अमृत ही समझकर,
और अन्तिम साँस तक,
जीता रहूँगा मैं,
तुम्हारे लिए,
सिर्फ तुम्हारे लिए...