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12.10.2007
 
तुम्हारे बिना
प्रकाश यादव निर्भीक

तुम्हारे बिना यह जिन्दगी अधूरी है,
आ जाओ तुम्हारी मौजूदगी जरूरी है।

मरुस्थल मेँ मर- मर कर जिया है मैँने,
गुलशन संग जीने की चाह सुनहरी है।

मधुमय जीवन एक सपना है मेरे लिए,
केक्टस बन जीना बस एक मजबूरी है।

आशा की किरण ले चलता रहा अब तक,
आशा बन साथ आओ अब बारी तुम्हारी है।

रात के उजालोँ मेँ मैँ ढूँढता रहा अब तक,
फिर भी न मिली मुझे कोई चिंगारी है।

अधूरा मिलन ही रहा है हर बार अपना,
आओ मिटा दें दूरी जो कसक हमारी है।

दुनियाँ से डर-डर कर तन्हा गुज़ारा हमने,
"निर्भीक" बन आ मिलो जो तमन्ना हमारी है।


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