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10.21.2007
 
तुम न आये
प्रकाश यादव निर्भीक

जेठ की तपती
दुपहरी धूप में
झुलसता रहा मैं
आज तक
तुम्हारे आने की
अदद उम्मीद लिए
दिलासा देता रहा
अपने बेचैन मन को
कि तुम आओगे

एक बार फिर
बरखा बन अचानक
मेरे मन की तपिश को
शीतल करने
मगर तुम न आये
बल्कि तृष्णा बन
छलावा करते रहे
अब तक मेरे साथ
और मैं पागल बन
आस लगाए
करता रहा तुम्हारा इंतजार
तुम्हारी बेवफ़ाई को ही
वफ़ा समझकर......


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