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10.21.2007
 
रेत
प्रकाश यादव निर्भीक

रेत का ढेर है
यह ज़िन्दगी
सपनों के घरौंदे
रेत से, रेत पर
बनते और ढहते हैं
पलभर में
हक़ीकत की दुनियाँ से
बेहद परे
अपनी कल्पना लोक में
सपने सारे
सच ही तो लगते हैं
इस छोटी सी
समय सीमा के भीतर
सच्चाई के सामने आने तक
इन नाजुक सपनों को
क्या पता कि
रेत कभी भी अपना
साकार रूप धारण नहीं करता
बल्कि जितनी ही जतन से
रखो उन्हें समेटकर
मुट्ठी में
वह उतनी ही तेजी से
फिसलता चला जाता है
मुट्ठी से
और कर जाता है खाली
मुट्ठी को
एक बार फिर
टूटे हुए
सपनों के साथ..


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