छूट गई पीछे
मेरी छत
इस शहर से कोसों दूर
सुदूर मेरे गाँव में
जिसके नीचे
न जाने कितनी
मधुर यादें पली हैं मेरी
गोधूलि की वेला में
अपने हमजोली के साथ
चिड़ियों के कलरव के बीच
कल्पना की नाव पर
विचरण करता हुआ
मेरा बचपन
कितने आशियाने बना डाले
अपने ख्वाबों के
अपनापन का अहसास था
उन सबों में
लगता था बस यही दुनियाँ है
छल-प्रपंच, धोखाधड़ी विहीन
लेकिन महानगर की
इस छत के नीचे
उन्हीं बातों का समावेश है
जिनकी कल्पना
मेरा कोमल मन
शायद कर नहीं पाया
कि पग पग पर
पीठ पीछे
पैर खींचने वालों की
तादाद है यहाँ
अपनत्व की तो बात दूर
यह सोचना भी गुनाह है
इसलिए फिर से
वहीं जाने की चाह है
उसी छत के नीचे
जो वास्तव में
मेरी छत है
इस शहर से दूर
सुदूर मेरे गाँव में