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12.30.2007
 
मंज़िल अनछुई सी
प्रकाश यादव निर्भीक

पिछली असफलताओँ को भूलकर,
और उसके दर्द को,
तेरा तोहफा ही समझकर,
पीता हुआ निकल पड़ता हूँ,
तुम्हारी खोज मेँ,
रेतभरी लीक से होकर,
नयी उमँग के साथ;
कटीली झाड़ियोँ को,
रौँदता हुआ डगर मेँ,
बढ़ता चला जाता हूँ,
नदी नालोँ को पार करता हुआ,
मस्ती मेँ,
अपने से अधिक बोझ लेकर;
तुम्हारी अदृश्य तस्वीर को,
बिठाकर अपने दिल मेँ,
पहुँच जाता हूँ,
उस गुफा के बिल्कुल करीब,
जहाँ शायद तुम छुपी हो,
तब तुम्हेँ पाकर,
नजदीक इस क़दर,
उमँगोँ की लहरेँ मारती हैँ हिलोरेँ,
उर मेँ, खुशी से पागल होने को,
होता है ये दिल कि,
तभी बड़ी बेरहमी से,
रोक देता है आकर मुझे,
एक विशाल शिलाखण्ड,
और रह जाती है मेरी मंज़िल,
फिर एक बार अनछुई सी


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