मैं
चला था
सफर में यूँ ही
नितांत अकेला
भटकते राहों में
दूर दूर तक
न था कोई हमसफर
जिससे बाँट सकूँ
अपनी भावनाओं को
और बाँट लूँ उनके
सारे दर्द को
अचानक मिली तुम
और तुम्हारा कोमल स्पर्श
जिसकी गर्माहट पाकर
प्रफुल्लित हो गया मैं
और जाना सफर में
हमसफर का मतलब
मगर मुझे क्या पता था
कि तुम एक बसंती बयार हो
जो अपनी महकती खुशबू देकर
चली जाती है दूर
बहुत दूर
मैं और तुम को
नदी के दो किनारे बनाकर
फिर से राह में
मैं को अकेला छोड़