अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
01.27.2008
 
लाचार आँसू
प्रकाश यादव निर्भीक

जब सपने टूट जाते हैँ किस्मत भी छोड़ देती है साथ,
और दिखाई पड़ती है, आशाओँ के खण्डहर मेँ,
फूल अधखिला सा, साथ ही -
न रहती है कोई, आशा की किरण जीवन मेँ,
जिसकी आस मेँ जिया जा सके,
एक ज़िन्दगी आशा की,
विवश हो जाता है,
तब इन्सान जीने को,
अनचाही ज़िन्दगी,
असफलता की लौ मेँ,
जलते हुए- मैँ और किस्मत के खींचातानी के बीच,
और न कोई रहता आसार,
आकस्मिक अमृत वृष्टि के,
सिवाय अग्निवृष्टि के,
तब निकलते हैँ नयनों से,
लाचार हो ये आँसू,
शीतलता प्रदान करने को।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें