इस एकाकी जीवन में,
एक झलक ही तुम्हें,
देख पाना क्या कम है,
उस पूनम के दीदार से,
जिसे देखने के लिए,
आमावस की काली कालिमा भी,
देखनी पड़ती है,
इस मरुस्थल जीवन में,
तुम्हारा अकस्मात आना,
क्या उन बादलों की तरह नहीं,
जिसे देख नाच उठता है,
पागल मदमस्त मयूर मन,
सुनसान बंजर उपवन
में,
तुम्हारा अचानक खिलना,
क्या उन गुलों की भाँति नहीं,
जिसका मकरन्द ले उडता है,
चंचल चित ले बेसुध अनंग,
तो
फिर क्यों ख़ामोश हो, ख़ामोशी का वातवरण बनाये,
मुझे भी ख़ामोश किये