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10.29.2007
 
जीवन का सच
प्रकाश यादव निर्भीक

योँ रंगविहीन
ज़िन्दगी गुजर जाती है, सुबह
होते ही फिर शाम चली
आती है; सिमटती जा रही है
अब अपनी दुनियाँ,
क्षणभँगुर जीवन की उम्र
कम होती जाती है। बचपन
बीतते ही यौवन आ जाता
है, सँग अपने दायित्व
सारी ले आती है; कितने
सपनेँ बिखरे योँ रह
जाते है, मिली जो मँजिल अब
तक वही रह जाती है।
अनन्त अम्बर मेँ विचरता
उन्मुक्त मन, नवजीवन
के पिँजडे मेँ बन्ध
जाता है; उलझता चला जाता
है निज उलझन मेँ,
जैसे मकड़ा उलझता है
खुद के बन्धन मेँ।
बढती चली जाती है अब उनसे
दूरियाँ, जिनके काफी
करीब थे कभी हम; अब
यादेँ ही रह जाती है दिल
मेँ, जिनसे जुदाई का सपना
न देखे थे हम। जीवन का
सच ही तो है ये सब,
इन्साँ का वस चला कहाँ इस
जहाँ मेँ; बस सपने
पूरे करते रहते है यहाँ
सब, देखते देखते यह उम्र
बीत जाती है।


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