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01.16.2009
 
हक़
प्रकाश यादव निर्भीक

किस हक़ से आता हूँ तेरे दर पे,
मुझे ये तो खुद मालूम ही नहीं;
न जाने क्यों ये बेकाबू कदम,
मुड़ जाते हैं अनायास उसी ओर।

तुमने न दिया हक़ अब तलक,
अपने दर्द ए दिल में आने को;
मैं यूँ ही चला आता हूँ बेशर्म बन,
तुझ पे अपना ही हक़ जताने को।

याद करना भी कभी मुनासिब न समझा,
हरवक़्त ये बात मुझे खलती रही;
एक बार भी जरा ये आज़माकर देख लो,
यह हक़ तुम्हारा ही है मुझ पर भी।

किस हक़ से कहूँ ये बात तुम्हेँ, कि
तुम चाँद हो मेरी ज़िन्दगी की;
जिसकी चाँदनी की शीतलता पाने को,
तपिश में ही ज़िन्दगी गुजार दी अब तलक।

हक़ का हक़ीकत है यही,
हक़ देता नहीं किसी को खुद कोई;
हक़ तो हक़ से लिया जाता है,
जिस पर जिसका हक़ होता है तनिक भी।


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