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| 01.16.2009 |
| हक़ प्रकाश यादव निर्भीक |
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किस हक़ से आता हूँ तेरे दर पे,
तुमने न दिया हक़ अब तलक,
याद करना भी कभी मुनासिब न समझा,
किस हक़ से कहूँ ये बात तुम्हेँ, कि
हक़ का हक़ीकत है यही, |
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